पालक से मिलेगी लैंड माइंस की जानकारी, भेजेगा ईमेल! सुनने में थोड़ा अजीब लगे लेकिन विज्ञान की ताक़त के आगे सपने भी सच होने लगते हैं । जरा सोचिए जब झारखंड में नक्सलियों द्वारालगाए गए लैंड माइंस का पता पालक शाक द्वारा लगने लगे । आप इसे मज़ाक़ में लेंगे लेकिन दुनिया की नंबर वन यूनिवर्सिटी मैसाच्यूसेट्स इंस्ट्टीयूट ऑफ टेक्नॉलॉजी(MIT) के वैज्ञानिकों के शोध ने ये कमाल करने की तैयारी कर ली है । पालक के गुण अभी तक हम शरीर में आयरन जैसे पोषक तत्वों की पूर्ति के तौर पर जानते थे लेकिन एमआईटी के वैज्ञानिकों ने जो शोध किया और जिस आविष्कार की ओर हम बढ़ रहे है उससे आने वाले दिनों में पालक की पहचान सिर्फ शाक के तौर पर नहीं बल्कि बेशक़ीमती पौधे के तौर पर होगी। वेबसाइट यूरो न्यूज़ की रिपोर्ट के मुताबिक़ एमआईटी के नैनो टेक्नोलॉजी के इंजीनियर्स ने पाया है कि पालक में विस्फोटकों के पता लगाने की अद्भुत शक्ति होती है इतना ही नहीं पालक विस्फोटक का पता लगा इसकी जानकारी ईमेल के ज़रिए वैज्ञानिकों तक भी भेज सकता है । वैज्ञानिकों के मुताबिक पालक की जड़ों में भूगर्भीय जल में मौजूद नाइट्रोमेटिक्स का पता लगाने की अद्भुत कला होती है । नाइट्रो्मेटिक्स लैंड माइंस में पाए जाने वाला एक तत्व है । पालक के नैनोट्यूब्स पत्तियों को ये संदेश भेजते हैं और इस संदेश को इन्फ्रारेड कैमरों से पढ़कर वैज्ञानिकों तक ईमेल भेजा जा सकता है । एमआईटी के शोधकर्ता इन दिनों पौधे में मौजूद इलेक्ट्रॉनिक्स कंपोनेंट और सिस्टम के बारे में अध्ययन कर रहे हैं । इसी अध्ययन केदौरान पालक की इस ख़ासियत की जानकारी मिली । शोधकर्ताओं के टीम लीडर प्रोफेसर माइक स्ट्रेनो कहते हैं ‘’ पौधों को रासायनिकविश्लेषण करने में महारत हासिल है । मिट्टी में उनकी जड़ें लगातार ग्राउंड वाटर का विश्लेषण करती रहती है । “ असल में ये शोध विस्फोटकों का पता लगाने, प्रदूषण की जानकारी हासिल करने और पर्यावरण में होने वाले बदलावों के बारे मेंजानकारी हासिल करने के लिए किया जा रहा है । प्रोफेसर स्ट्रैनो बताते हैं कि पौधों को ये पहले ही पता चल जाता है की आने वाले दिनों में सूखा पड़ने वाला है । मिट्टी और जल में होने वाले थोड़े भी बदलावों का पता पौधे फ़ौरन लगा लेते हैं । अगर हम उनके केमिकल सिग्नल के रास्ते का पता लगा लें तो हमें बहुत फ़ायदा मिलेगा । इतना ही नहीं पालक में इतनी खूबी है कि वो मेटल एयर बैटरी बनानेमें मदद कर सकती है। जैसा कि हम जानते हैं कि पालक में आयरन और नाइट्रोजन की मौजूदगी होती है और इसीलिए शोधकर्ताओं ने इसका चुनाव किया ।
आज़ादी मिले अभी १५० दिन भी नहीं हुए थे , देश का संविधान अभी बन ही रहा था, महात्मा गांधी ज़िंदा थे। देसी रियासतें और राजघराने अभी भी भारत की एकता के रास्ते में रोड़े बने हुए थे। हिन्दुस्तान पहली बार आज़ाद हवा में नए साल का जश्न मना रहा था,तभी 1 जनवरी 1948 की दोपहर जालियांवाला बाग कांड हो गया। अपने ही देश के सेना और पुलिस ने अपने ही लोगों को गोलियों से भून डाला । 1 हज़ार लोग मारे गए । इतने ही लोग बुरी तरह जख्मी हुए । खरसावा नरसंहार, देश के इतिहास के पन्नों का वो का अध्यायहै जिसे ग़ैर आदिवासियों द्वारा साज़िशन मिटाने की कोशिश की जाती रही लेकिन झारखंड के निर्माण के लिए दी गई सबसे बड़ी शहादत को कोई भी झारखंडी भूल नहीं सकता । क्या हुआ था 1 जनवरी 1948 को, कितने लोगों की जान गई थी, कितने हमेशा के लिए अपंग हुए और कौन था इसके लिए ज़िम्मेदारइसकी पड़ताल झारखंड के इतिहास को समझने के लिए बेहद ज़रूरी है। 1 जनवरी 1948 को हुए खरसावां नरसंहार की आँखों देखी कोसुनने के लिए 11 जनवरी 1948 को खरसावां में आदिवासी महासभा के अध्यक्ष और झारखंड राज्य की आवाज़ बुलंद करने वाले जयपाल सिंह मुंडा का वो ऐतिहासिक भाषण सुनना ज़रूरी हैं जिसमें उन्होंने कहा “ हमलोग यहाँ दो कारणों से इकट्ठा हुए है पहला- यहाँसे कुछ ही गज की दूरी पर ओड़िशा प्रशासन द्वारा एक हज़ार लोगों की नृशंस हत्या के प्रति अपना शोक जताने के लिए और दूसरा पूरीदुनिया को ये बताने के लिए हम।छोटानागपुर की प्रशासनिक व्यवस्था को छिन्न-भिन्न करने की तमाम कोशिशों को हम नाकाम करने के लिए प्रतिबद्ध है ।’’ जसपाल सिंह मुंडा के इस ऐतिहासिक भाषण को सुनने के लिए लगभग 35 हज़ार लोग इकट्ठा थे जो हजारीबाग,जमशेदपुर,राँची जैसे शहरों से भी पहुँचे थे । उन्होंने हज़ारों की भीड़ के सामने खरसावां नरसंहार के ख़िलाफ़ आक्रोश प्रकट करते हुए कहा “ यहाँ 1 जनवरी की घटना के चश्मदीद मौजूद हैं , लेकिन मैं आपका बताना चाहता हूँ कि उस दिन यहाँ क्या हुआ था । १ जनवरी को खरसावां के बाज़ार में आम सभा आयोजित की गई थी । सभा की इजाज़त ली गई थी और ग़ैर अनापत्ति पत्र भी नई-नई स्थापित ओड़िशा प्रशासन द्वारा प्राप्त की गई थी । सब कुछ व्यवस्थित चल रहा था । सभा में चाईबासा,जमशेदपुर, मयूरभंज, राज ओआंगपुर जैसी जगहों से लोग पहुँचेथे । सभा शुरू होने से पहले आदिवासी नेता खरसावां के राजमहल पहुँचे और उनसे बातचीत हुई । राजा ने खरसावां को ओड़िशा में शामिल करने की इजाज़त दे दी थी लेकिन आख़िरी सेटलमेंट अभी लंबित थी।। 2 बजे आदिवासी नेता महल से लौटे और सभा स्थल परपहुँच कर भाषण हुआ, 4 बजे सभा में मौजूद 35 हज़ार लोगों को अपने -अपने घरों में लौटने के लिए कहा गया, आधे घंटे बाद घर लौटते आदिवासियों पर ओड़िशा प्रशासन ने मशीनगन द्वारा गोलियों की बौझार कर दी। आधे घंटे तक फ़ायरिंग चलती रही। सभा में आए आदमियों, बच्चों, महिलाओं, की पीठ गोलियों से छलनी हो गई, यहाँ तक की गाय और बकरियों को भी गोलियाँ लगीं, खरसावां बाज़ार खून से लाल हो गया । “ जयपाल सिंह मुंडा ने सभा में खरसावां नरसहांर को आज़ाद भारत का जालियाँवाला बाग करार दिया । उनके भाषण को 72 साल बादभी सुन कर रोंगटे खड़े हो जाते हैं। जनरल डायर तो अंग्रेज था जिसने।अमृतसर के जालियांवाला बाग में क्रूरता की सारीं हदें पार कर दींलेकिन आज़ाद देश के प्रांत ने बेक़सूर आदिसवासियों के साथ जो बर्बरता की वो आज भी नाक़ाबिले माफ़ी है । उन्होंने 11 जनवरी को दिए अपने भाषण में आगे कहा “जैसे ही फ़ायरिंग खत्म हुई खरसावां बाज़ार में खून ही खून नज़र आ रहा था.चारों ओर मांस के लोथड़े थे, लाशें बिछीं थी, घायल तड़परहे, पानी माँग रहे थे लेकिन ओड़िशा प्रसाशन ने ना तो बाज़ार के अंदर किसी को आने दिया और ना ही यहाँ से किसी को बाहर जाने कीइजाज़त दी । घायलों तक मदद भी नहीं पहुँचने दी। आाजाद हिन्दुस्तान में ओड़िशा ने जालियाँवाला बाग कांड कर दिया यही नहीनृशंसता की सारी हदें पार करते हुए शाम ढलते ही लाशों को ठीकाने लगाना शुरू कर दिया । ६ ट्रकों में लाशों को भरकर या तो दफनकर दिया गया या फिर जंगलों में बाघों के खाने के लिए फेंक दिया गया । नदियों की तेज धार में लाशें फेंक दी गई । घायलों के साथतो और भी बुरा सलूक किया गया जनवरी सर्द रात में कराहते लोगों को खुले मैदान में तड़पते छोड़ दिया गया माँगने पर पानी भी नहींदिया गया ।’’ जब जयपाल सिंह मुंडा बर्बरता की इस खूनी दास्ताँ को सुना रहे थे तब पूरी सभा में सन्नाटा छाया हुआ था लगभग ३५ हज़ार लोगों केजेहन में सिर्फ आक्रोश था । 4...
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