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1857 में शहीद अनाम क्रांतिकारियों को शत-शत नमन
शहीदों के परिजनों की किसी ने कभी कोई सुध न ली
देश की आजादी की लड़ाई में कई राष्ट्र-भक्तों ने अपनी कुर्बानी दी, कई स्वतंत्रता सेनानियों ने वर्षाें तक संघर्ष किया, महीनों-वर्षाें जेल में रहे, अंग्रेजों से आजादी भी मिल गयी। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद सरकार व समाज ने उनसभी महान स्वतंत्रता सेनानियों का गुणगान शुरु कर दिया। कई स्वतंत्रता सेनानियों व उनके वंशजों को सरकारी सहयोग राशि भी मिलने लगी, लेकिन देश शहीद हुए उन अनाम क्रांतिकारियों के परिजनों की कभी सुध लेने की कोई जहमत नहीं उठायी, जिस मां-बाप ने अपने बुढ़ापे के लाठी को खो दिया या जिसकी पत्नी ने युवा अवस्था में ही प्राण-परमेश्वर को खो दिया, जिस दूधमुंहे बच्चे ने अपने जीवन में कभी पिता के प्यार को अनुभव नहीं कर पाया।
1857 में प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में चतरा में शहीद हुए 150 क्रांतिकारियों की भी ऐसी ही कहानी है।आजादी की लड़ाई में इन सभी ने देश की आन के लिए अपने प्राणों का न्यौछावर कर दिया। इनमें से जय मंगल पांडेय व नादिल अली साह के बारे में कुछ जानकारी तो लोगों को मिल जाती है, लेकिन उनके साथ शहीद करीब 150 अन्य क्रांतिकारियों के बारे में कभी किसी ने कोई सुध लेने की भी कोशिश नहीं की। भारत माता की आजादी के इन दिवानों के परिजनों का क्या हाल हुआ,बाद में कुछ पता नहीं चल सका।
इतिहासकार प्रो. इफ्तेखार आलम बताते है कि बिहार में 1987ई. की क्रांति का सबसे बड़ा और निर्णायक युद्ध चतरा में हुआ था। तब चतरा ( उस वक्त चतरा 1760 से 1834 ई. तक छोटानागपुर का प्रशासनिक मुख्यालय था) ही छोटानागपुर में 1857 में ई. में फांसी का पहला स्थान बना। उन्होंने बताया कि 3 अक्टूबर 1857ई. को चतरा में 150 सैनिक मारे गए थे, जबकि 4 अक्टूबर को सूबेदार जयमंगल पांडेय(छपरा निवासी कुंज बिहारी पांडेय के पुत्र) और नादिर अली खां (बिहार के चरकोसा निवासी) को गदर की धारा 17 के अनुसार फांसी दी गयी। उन वीरों को उसी स्थान पर फांसदी गयी (फांसीहारी तालाब),जहां दो दिन पहले अपने शौर्य एवं पराक्रम का परिचय दिया था। ऐतिहासिक साक्ष्य के अनुसार चतरा में 77 क्रांतिकारियों को एक ही गड्ढे में दफन कर दिया था, जबकि 77 क्रांतिकारियों को आम के पेड़ों पर लटकाकर फांसी दी गयी थी( 4 अक्टूबर 1857 ई. में काली पहाड़ी कैम्प सिम्पसन का पत्र डाल्टन के नाम के अनुसार) । इस युत्र् में अंग्रेजों को क्रांतिकारियों की ढेर सारी संपत्ति व हथियार हाथ लगी, जिसे हजारीबाग तक ले जाने के लिए मेजर इंग्लिश को 100 आदमियों की आवश्यकता थी और इसके लिए कोलकाता के जेनरल मेन्सफील्ड को 7 अक्टूबर को एक तार संदेश (रात 7.30बजे) भेजा गया, जिसमें कहा गया था-सड़क बहुत खराब है, इसलिए आदमियों को उन हथियारों को खींच कर ले जाने के लिए भेज दिया जाए। वस्तुततः चतरा युद्ध की विजय ने ही हजारीबाग जिले में आंदोलन को कुचल दिया, यद्य्नपि यह क्रांति दब गयी, लेकिन स्वतंत्रता की चिंगारी बुझायी नहीं जा सकी।
इस क्रांति के संबंध में यह साक्ष्य मिलते है कि 30 जुलाई
1857 को प्रथम संग्राम के आह्नान पर रामगढ़ बटालियन के 8वीं नेटिव इन्फैंट्री के जवानों ने सम्मिलित होने का संकल्प लिया। उन्होंने रामगढ़ से रांची के लिए कूच किया। जिसके बाद सितंबर 1857 में अमर सेनानी वीर कुंवर सिंह की सेना में सम्मिलित होने के लिए चल पड़े, लेकिन 2 अक्टूबर 1857 को इसी पुण्य स्थल पर मेजर इंग्लिश की सेना के साथ उनकी मुठभेड़ हुई और लगभग 150 स्वतंत्र्ाता सेनानियों ने अपने प्राणों की आहुति दी। इस हरजीवन तालाब (अब फांसीहारी तालाब) के किनारे वृक्षों में वीरों के शव लटका दिए गए। जिस चतरा की धरती रक्तिरंजित हो गयी थी और लाशो ंकी संड़ाध अंग्रेज सहन नहीं कर पाने पर फिरंगी अपने कैंप को तालाब से हटाकर काली पहाड़ी(चतरा से एककिमी दूर दक्षिण पूर्व) ले गए। इस लड़ाई में 56 अंग्रेजी सैनिक भी मारे गए, जिसमें 10 सिख बटालियन और 46यूरोपीय थे। अंग्रेजों ने अपने सैनियों के लिए एक कब्रगाह (चर्चयार्ड) बनाया और उस उन सभी को दफना कर स्मारक बनवा दिया, लेकिन क्रांतिकारियों की कोई सुध करीब एक सदी तक किसी ने नहीं ली, बाद में 1963 में उस फांसी तालाब में एक स्मारक बनाया गया,जो अब भी उपेक्षा का शिकार है। आजादी की पहली पड़ाई में फांसी पर चढ़े जवानों के परिजनों व आश्रितों की भी कभी कोई खोज-खबर नहीं ली गयी, जबकि हकीकत है कि रांची में 20अक्टूबर 1857 को 20 क्रांतिकारियों और 24 अक्टूबर 1857 को 23 क्रांतिकारियों को फांसदी गयी, जबकि चतरा में इससे पहले 3 अक्टूबर को ही लगभग 150 क्रांतिकारी शहीद हो गए थे। इन क्रांतिकारियों के परिजनों को शत-शत नमन।
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