कर हस्तांतरण में बढ़ायी गया 42 प्रतिशत की हिस्सेदारी की समीक्षा से केंद्र व राज्यों के बीच बढ़ेगी खटास
रांची, 24 अप्रैल । भारत की संघीय प्रणाली में सम्मिलित रूप से राज्यों का यह हक है कि वे केन्द्रीय करों से प्राप्त राजस्व में अपना हिस्सा हासिल करें और प्रत्येक राज्य का भी यह संवैधानिक अधिकार है कि राज्यों के कुल हिस्से में से अपना उचित हिस्सा प्राप्त करे। केन्द्र द्वारा संग्रहित कर प्राप्तियों को केन्द्र और राज्यों के बीच वितरण करने एवं राज्यों के हिस्से में आये भाग का क्षैतिज वितरण राज्यों के बीच करने के काम के सुचारू सम्पादन के लिए वित्त आयोग के गठन का प्रावधान हमारे संविधान में किया गया है। यह वित्तीय आयोग एक अर्द्धन्यायिक संवैधानिक निकाय है जिसकी अनुशंसाएॅं सलाहकारी प्रवृति को होती है और संसद से स्वीकृति प्राप्त सिफारिशें ही पॉंच साल की अवधि के लिए प्रभावी होती है। मालूम हो कि 14वें वित्त आयोग की स्वीकृत सिफारिशें 31 मार्च 2020 तक ही वैध है। 1 अप्रैल 2020 से 15वें वित्त आयोग की सिफारिशें लागू होंगी। इसके लिए एनएन सिंह की अध्यक्षता में 15वें वित्त आयोग के गठन की स्वीकृति नवम्बर 2017 में मिल चुकी है और अपने चार अन्य सदस्यों के साथ 15वॉं वित्त आयोग अपना काम करना भी प्रारम्भ कर दिया है।
वित्त आयोग का एक दूसरा काम यह भी है कि भारत की संचित निधि में से राज्यों के राजस्व में सहायता अनुदान को शासित करने वाले सिद्धान्तों के बारे में सुझाव देना जिसको हम संविधान के अनुच्छेद 275 के साथ जोड़ कर देख सकते हैं जो संसद को हर साल जरूरतमंद राज्यों के लिए अनुदान और सहायता मंजूर करने का अधिकार प्रदान करता है।
15वें वित्त आयोग के लिए निर्धारित ‘‘संदर्भ की शर्तें इसे आज सर्वाधिक चर्चा के केन्द्र में बनाये हुए हैं। दक्षिण के राज्य पूरे उबाल पर है और इसके हानिकारक प्रभावों को लेकर वित्त मंत्रियों के सम्मेलन में बीते दिनों में त्रिवेन्द्रम में चर्चा भी की है और अपने स्वर को विस्तार देने के लिए भावी कार्यक्रम भी तय किये हैं। वे संदर्भ की शर्तें क्या है जिनके कारण दक्षिण के राज्य आक्रोश में हैं और इसके अलावा वो कौन-कौन सी शर्तें हैं जिनसे सहकारी संघवाद की भावना को आघात लगने की आशंका है उन पर गौर करेंगे इस आलेख में।
15वें वित्त आयोग के लिए निर्धारित तीन प्रमुख संदर्भित शर्तें जो आयोग के लिए सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक चुनौतियों का रूप धारण कर रही है। वित्तीय संसाधनो के वितरण के लिए वर्ष 2011 की जनगणना के ऑंकडों को आधार बनाना। अभी तक वर्ष 1971 की जनगणना के ऑकड़ों को वितरण का फार्मूला तय करने के लिए उपयोग किया जाता रहा है। जनगणना आधार वर्ष में बदलाव के कारण दक्षिण के राज्य एवं अन्य दूसरे राज्य जिन्होंने 1971 और 2011 की अवधि में जनसंख्या स्थिरीकरण के लिए गंभीर प्रयास कर आबादी के नियंत्रण में कामयाबी हासिल की है उन्हें यह डर है कि कम आबादी के कारण वित्तीय साधनों के बंटवारें में उनकी हिस्सेदारी कम हो जायेगी। 15वें वित्त आयोग के निर्धारित इस संदर्भ को परफारमिंग स्टेट एक विकृत प्रोत्साहन मान रहे हैं। इसके विपरीत राष्ट्रीय आबादी नियंत्रण नीति के विरूद्ध जो राज्य आबादी नियंत्रण में शिथिल रहे हैं, उन्हें अधिक आबादी के कारण राजस्व हिस्सेदारी का अपेक्षाकृत ज्यादा बड़ा भाग मिलेगा। मालूम हो कि 1971 की जनगणना के अनुसार दक्षिण के राज्यों की आबादी देश की कुल आबादी का 24.7 प्रतिशत थी जो 2011 की जनगणना में घटकर 20.7 प्रतिशत हो गयी है। दक्षिण के राज्यों को आबादी नियंत्रण में जो सफलता मिली है उसके लिए उन्होंने शिक्षा, स्वास्थ्य, महिला सशक्तिकरण और विकास कार्यों में अधिक खर्च की कीमत चुकायी है। ऐसे में दक्षिण के राज्यों की चिंता को हास्यास्पद बताना या निराधार बताना उचित नहीं प्रतीत होता है। तमिलनाडू एवं केरल राज्य को तो सबसे ज्यादा नुकसान का खतरा उत्पन्न हो गया है। इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि 14वें वित्त आयोग द्वारा 2011 की जनगणना के लिए मात्र 10 प्रतिशत का भारांक देने की वजह से तमिलनाडू की हिस्सेदारी में 19 प्रतिशत की कमी आ गयी थी। पहले कर्नाटका, आंध्रा, केरला, पण्डुचेरी के वित्त मंत्रियों की बैठक और बाद में तमिलनाडू के वित्तमंत्री सह उप-मुख्यमंत्री के नेतृत्व में 40 सांसद के प्रतिनिधिमण्डल का 15वें वित्त आयोग के चेयरमैन एनएन सिंह से मिलकर ज्ञापन सौंपने की घटनाओं को गंभीरता से लिये जाने की जरूरत है। दक्षिण के चिंतित राज्यों की चिन्ता को हल्के में लेने के वजाय उनकी चिंता पर पड़ताल करने की जरूरत है।
संतोष की बात यह है कि प्रदर्शन आधारित प्रोत्साहन देने के लिए जो दायरें तय किये गये हैं उनमें एक दायरा यह भी है कि राज्यों ने प्रजनन शक्तिदर को प्रतिस्थापन दर पर लाने के लिए क्या प्रयास किया है। संदर्भित शर्तों में यह शर्त शामिल रहने के कारण 15वां वित्त आयोग आबादी नियंत्रण के प्रयासों के लिए एक अच्छा भारांक देकर घाटे की कुछ भरपायी कर सकता है।
चिन्ताजनक संदर्भित दूसरी शर्त यह है कि कमजोर राज्यों को मिलने वाले राजस्व घाटा अनुदान पर 15वां वित्त आयोग पुर्नविचार करेगा। यानि समीक्षा कर नया वित्त आयोग यह बतायेगा कि अब राज्यों को राजस्व घाटे की भरपायी के लिए अनुदान दिया जाय या बंद कर दिया जाय। ज्ञात रहे कि 14वें वित्त आयोग ने ग्यारह राज्यों के लिए 1,94821 करोड़ रूपये राजस्व घाटा अनुदान देने की सिफारिश की थी और यह अनुदान संविधान प्रदत्त है। जो राज्य राजस्व संग्रहण में कतिपय कारणों से कमजोर है और आय के अपने साधन सीमित है वैसे राज्यों को संविधान के इस प्रावधान के तहत सहायता मिल जाती है परन्तु संदर्भित शर्तों के दबाव में यदि आयोग इस अनुदान सहायता को बंद करने की अनुशंसा करता है तो यह संविधान की भावनाओं के खिलाफ होगा और कमजोर राज्यों के विकास में बाधक भी होगा।
तीसरी चिंताजनक बात जो संदर्भ की शर्तों में शुमार है वह यह कि 14वें वित्त आयोग द्वारा राज्यों को कर हस्तांतरण में बढ़ायी गया 42 प्रतिशत की हिस्सेदारी की समीक्षा करेगा नया आयोग। संदर्भ की इस शर्त को राज्यों को आवंटन कम करने के प्रयास के रूप में देखा जा रहा है। केन्द्र सरकार का ऐसा कोई भी प्रयास संघीय भावना के विपरीत होगा और यह निर्णय केन्द्र एवं राज्यों के संबंधो में खटास ही पैदा करेगा। कर हस्तांतरण से प्राप्त राजस्व से राज्य की सरकारें अपनी प्राथमिकताओं के अनुसार खर्च करती है।
इ सके अलावा प्रदर्शन आधारित प्रोत्साहन के जो बिन्दु विचार के लिए लाये गये है ,जिसमें टैक्स बेस बढ़ाने के लिए किये गये प्रयास , जनसंख्या को स्थिर रखने के लिए किये गये प्रयास , केन्द्र की फ्लैगशिप योजनाओं का क्रियान्वयन , पूंजीगत खर्चे को बढ़ाने के लिए किये गये उपाय , डीबीटी द्वारा बचत यानि डिजिटल अर्थव्यवस्था को प्रोत्साहन के प्रयास , व्यापार सुगमता , सेनिटेशन एवं स्वच्छता एवं बिजली बोर्ड के घाटों को खत्म करने के लिए प्रयास एवं लोक लुभावन स्कीम पर होने वाले खर्च पर नियंत्रण। ये सभी केन्द्र सरकार की सोंच को प्रतिविम्बित करते हैं परन्तु लोक लुभावन स्कीम की परिभाषा तय करना क्या किसी चुनौती से कम है। किसान कर्ज माफी को लोक लुभावन की श्रेणी में लाने की चुनौती भी 15वें वित्त आयोग के समक्ष रहेगी।
ज्ञात रहे कि 14वें वित्त आयोग ने केन्द्रीय करों में राज्यों की हिस्सेदारी तय करने के लिए 1971 की जनगणना के ऑंकड़ों के लिए 17.5 प्रतिशत और 2011 की जनगणना के लिए 10 प्रतिशत का भारांक (वेटेज) निर्धारित किया था। फिसकल कैपेसिटी का भारांक बढ़ाकर 50 प्रतिशत कर दिया था। 15 प्रतिशत का भारांक इनकम डिस्टेंस यानि सर्वाधिक आय वाले राज्य से दूरी और वन अच्छादन को 7.5 प्रतिशत का भारांक दिया था। 15वें वित्त आयोग के लिए तय संदर्भित शर्तों में वन आच्छादन को शामिल नहीं किया गया है। सामाजिक प्रक्षेत्र में व्यय तथा सतत विकास लक्ष्य ( एस.डी.जी.) के 17 सूत्री विकास लक्ष्यों के लिए राज्य द्वारा किये जाने वाले प्रयासों को भी 15वें आयोग की संदर्भित शर्तां में शामिल कर लेना अच्छा होगा।
संबंधित सभी पक्षों की चिंता पर गंभीरता के साथ विचार करते हुए एक मान्य समाधान की तलाश के साथ राष्ट्र के ठोस वित्त हित में न्यायसंगत विकास सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक पहलों के लिए वाजिब भारांक (वेटेज) के सहारे 15वां वित्त आयोग अपनी अनुशंसाएॅं राष्ट्रपति को प्रस्तुत करेगा।