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सीएनटी-एसपीटी व निलंबन को लेकर विस में हंगामा

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सदन की कार्यवाही दिन भर रही बाधित
रांची,20जनवरी। झारखंड विधानसभा में आज छोटानागपुर – संतालपरगना काश्तकारी अधिनियम (सीएनटी-एसपीटी एक्ट) में संशोधन को वापस लेने और झारखंड मुक्ति मोर्चा(झामुमो)-कांग्रेस के चार विधायकों के निलंबन पर पुनर्विचार की मांग लेकर जमकर हंगामा हुआ, जिसके कारण सदन की कार्यवाही दिनभर बाधित रही।
बजट सत्र के चौथे दिन आज विधानसभा अध्यक्ष दिनेश उरांव द्वारा पूर्वाह्न 11 बजे पदभार ग्रहण करने के साथ ही झामुमो-कांग्रेस के चार निलंबित विधायकों के निलंबन वापस को लेकर सकारात्मक चर्चा शुरु हुई। विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष हेमंत सोरेन ने कहा कि निÜचत रुप से आसन की गरिमा को बनाये रखना जरुरी है। उन्होंने बताया कि 23नवंबर 2016 को सीएनटी-एसपीटी एक्ट में संशोधन को लेकर जनप्रतिनिधियों द्वारा असंसदीय तरीके से बात रखी गयी, लेकिन बहुत सारे सत्र में ऐसी घटनाएं घटी है, जब सदन में उत्तेजना का माहौल उत्पन्न हुआ है। उन घटनाओं को सदन और आसन ने गंभीरतापूर्वक लिया और सदन की गरिमा को ध्यान में रखकर समाधान का रास्ता भी निकाला। हेमंत सोरेन ने कहा कि सीएनटी-एसपीटी एक्ट में संशोधन का मसला आज भी उतना ही ज्वलंत मुद्दा है, कई विधायक पहली बार चुन कर आये है, इसलिए निलंबन के फैसले पर पुनर्विचार होना चाहिए और विधायिका तथा सदन की गरिमा को बरकरार रखा जाना चाहिए।
झारखंड विकास मोर्चा विधायक दल के नेता प्रदीप यादव ने कहा कि सीएनटी-एसपीटी एक्ट में संशोधन के मुद्दे को लेकर सदन में अपनी बात रख रहे कई विपक्षी सदस्य आक्रोशित थे। उन्होंने कहा कि सदन में अपनी बातों को रखने के लिए लक्ष्मण रेखा को पार नहीं करना चाहिए। उन्होंने कहा कि आसन के मर्यादा का ख्याल रखा जाना चाहिए, लेकिन विधानसभा की सदाचार समिति की अनुशंसा पर हुई कार्रवाई कठोर है, इस पर पुनर्विचार करने की जरुरत है। प्रदीप यादव ने एक पूर्व का उदाहरण देते हुए बताया कि उत्तेजित हो कर एक बार वे भी सदन के अंदर आये थे और एक दिन लिए निलंबन हुआ था, लेकिन उन्होंने अपनी गलती स्वीकार की और तुरंत आसन द्वारा पुनर्विचार हुआ तथा निलंबन समाप्त हुआ। उन्होंने कहा कि आसन पक्ष-विपक्ष को साथ लेकर चलने के स्वस्थ लोक परंपरा का निर्वहन करता है, इसलिए दंड के प्रावधान पर पुनर्विचार होना चाहिए।
कांग्रेस विधायक दल के नेता आलमगीर आलम ने भी विधायकों के निलंबन पर पुनर्विचार की वकालत करते हुए कहा कि पहले भी विधानसभा के अंदर विरोध होता रहा है, इस तरह का बर्ताव सदन में अनेकों पर देखा गया है, लेकिन सदाचार समिति के प्रतिवेदन पर चार विधायकों को निलंबित कर दिया, इस पर पुनर्विचार की जरुरत है।
सत्तारुढ़ दल के मुख्य सचेतक राधाकृष्ण किशोर ने यह विधायी संस्था राज्य की सवा तीन करोड़ जनता का प्रतिनिधित्व करती है, लोगों के विश्वास का प्रतिक है। उन्होंने कहा कि निर्वाचित प्रतिनिधियों के भी कई दायित्व है, यह सिर्फ विधानसभा का सचिवालय नहीं है, अपितु मंदिर है, इसकी गरिमा को अक्षुण्य बनाये रखने की जरुरत है। उन्होंने कहा कि सदन की गरिमा को बनाये रखने की मर्यादा का पालन सभी की जिम्मेवारी करती है। राधाकृष्ण किशोर ने कहा कि यदि कोई सदस्य हृदय से पÜचाताप करने को तैयार है, तो क्षमा करना कर्त्तव्य बनता है।
संसदीय कार्यमंत्री सरयू राय ने कहा कि यह एक गंभीर विषय है, ऐसे निर्णय से किसी को प्रसन्नता नहीं होती है। उन्होंने कहा कि विधानसभा की कार्य संचालन नियमावली के तहत सदस्यों को अपनी बातें रखनी चाहिए। उन्होंने कहा कि नीतियों के खिलाफ बातें रखने के वक्त कई बार उत्तेजना का माहौल बन जाता है और कई बार बात रखने वाले सदस्यों का विवेक लुप्त हो जाता है, कई बार मुद्दे उठते है और सदस्य अनजाने में अपनी बातों पर जोर देने की कोशिश में यह भूल जाते है कि उनका आचरण कैसा है। संसदीय कार्यमंत्री ने कहा कि आसन को पक्षपात रहित माना जाता है और आसन के ऊपर ही कोई प्रहार कर दें, स्प्रे छिड़कने की कोशिश करें, इस तरह की घटना सभी को शर्मसार करने वाली है। उन्होंने कहा कि यह भी माना जा सकता है कि भवावेष में आकर इस तरह का आचरण हुआ, लेकिन सदाचर समिति मूकदर्शक बनी रह कर सारी बातों को देखते रहे, यह भी स्वस्थ परंपरा नहीं होगा, इसलिए सत्तापक्ष को निर्णय लेना पड़ता है। उन्होंने निलंबन वापसी के मसले पर अपनी बात रखते हुए कहा कि विधानसभा अध्यक्ष अपने कार्यालय कक्ष में सदन के नेता और नेता प्रतिपक्ष से विचार-विमर्श कर फैसला लें।
मुख्यमंत्री रघुवर दास ने कहा कि चार विधायकों के निलंबन का निर्णय सदन में बहुमत का फैसला था। उन्होंने निलंबन का निर्णय विधानसभा अध्यक्ष या सरकार का निर्णय नहीं था, सदन की सदाचार समिति की अनुशंसा के तहत यह कार्रवाई हुई। मुख्यमंत्री ने कहा कि सदाचार समिति ने अनुशंसा करने के पहले विधायकों को तीन-तीन बार बुला कर अपना पक्ष रखने का मौका भी दिया, लेकिन वे अपने पक्ष को भी रखने को तैयार नहीं थे। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र मर्यादाहीन नहीं हो सकता, पक्ष-विपक्ष के सदस्य को अपनी बात को रखने का अधिकार है, लेकिन लोकतांत्रिक तरीके से ही बातों को रखा जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि निर्वाचित होने वाले विधायक भी संविधान की शपथ लेते है, इसलिए संविधान का अवहेलना नहीं किया जाना चाहिए। मुख्यमंत्री ने कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में मतभेद स्वभाविक है, नीतियों पर भी मतभेद हो सकते है, मानवीय गुण के कारण भी मतभिन्नता रहती है, लेकिन अपनी बातों को परंपरा और मर्यादा के अनुसार ही रखा जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि जब विधेयक के पक्ष में बहुमत है, तो बहुमत की बात को मानना चाहिए। उन्होंने कहा कि पिछले दो विधानसभा सत्र से इस तरह की घटना हो रही है, सदन की कार्यवाही बाधित रहने से पक्ष-विपक्ष के सभी सदस्य दुःखी है। मुख्यमंत्री ने यह भी कहा कि सदन को गुंडागर्दी का अखाड़ा नहीं बनने दिया जा सकता, यह मस्तिष्क का अखाड़ा होना चाहिए। लेकिन पिछले दिनों हुई घटनाओं से झारखंड कलंकित हुआ है, राज्य की सवा तीन करोड़ जनता को कलंकित करने का अधिकार किसी को नहीं है। मुख्यमंत्री ने कहा कि आवेश में कभी-कभी बातें हो जाती है, लेकिन सदन को चलने नहीं दिया जाएगा, यह हीं हो सकता है। उन्होंने कहा कि झाविमो के प्रदीप यादव ने भी उदाहरण देकर बताया कि उन्होंने अपनी गलती स्वीकार की, यदि निलंबित विधायक पÜचाताप करने को तैयार है, तो हम सब निलंबन के फैसले पर पुनर्विचार को तैयार है।
विधानसभा अध्यक्ष दिनेश उरांव ने कहा कि सदन की गरिमा को बचाने में सभी सदस्यों का अहम भूमिका होती है। उन्होंने कहा कि आसन में आसित व्यक्ति को दायित्वों के निर्वहन को लेकर कुछ कठोर निर्णय लेने पड़ते है। विधानसभाध्यक्ष ने कहा कि निलंबन वापसी के संबंध में यदि नेता प्रतिपक्ष और कांग्रेस विधायक डॉ. इरफान अंसारी की ओर से विधायक दल के नेता की ओर से लिखित आवेदन दिया जाए, तो वे सभी दलों के नेताओं, वरिष्ठ सदस्य स्टीफन मरांडी, सत्तारुढ़ दल के मुख्य सचेतक के साथ बैठक करने के बाद इस पर पुनर्विचार करेंगे। उन्होंने अपनी बातों को रखने के बाद प्रश्नोत्तरकाल की कार्यवाही शुरु कराने की कोशिश की, लेकिन झामुमो के चंपई सोरेन ने सीएनटी-एसपीटी एक्ट में संशोधन की वापसी को लेकर खड़ा हो गये। झामुमो के कई अन्य विधायक भी संशोधन विधेयक वापसी की मांग को आसन में आ गये। इस बीच झामुमो के स्टीफन मरांडी ने विधानसभा से आग्रह किया गया कि निलंबन के फैसले के लिए विधानसभा अध्यक्ष को सदन की सदाचार समिति की अनुशंसा की कोई जरुरत नहीं थी। उन्होंने एकीकृत बिहार विधानसभा का भी कई उदाहरण देते हुए बताया कि वहां भी कई बार उत्तेजना का माहौल उत्पन्न हुआ, लेकिन क्षमा मांगने के बाद समाधान निकल सका। स्टीफन मरांडी ने कहा कि आसन सर्वापरि है, उसे किसी अनुशंसा की जरुरत नहीं होती है, लेकिन सीएनटी-एसपीटी एक्ट में संशोधन के मसले को लेकर जनप्रतिनिधियों पर दबाव है, इसी दबाव के कारण वे सदन में अपनी बातों को रख रहे है। उन्होंने निलंबन के फैसले पर पुनर्विचर करने का आग्रह किया और सदन की कार्यवाही को 10 मिनट तक स्थगित कर विधानसभा अध्यक्ष से अपने चेंबर में दलीय नेताओं के साथ विचार-विमर्श करने का आग्रह किया।
विधानसभा अध्यक्ष ने प्रश्नकाल शुरु कराने की कोशिश करते हुए भाजपा के विरंची नारायण को अपनी बात रखने को कहा। विरंची नारायण ने दवा दुकानदारों पर हो रही कार्रवाई का जिक्र किया और इस पर स्वास्थ्यमंत्री रामचंद्र चंद्रवंशी की ओर से भरोसा दिलाया गया कि अधिनियम में बदलाव को लेकर केंद्र सरकार को पत्र लिखा जाएगा। लेकिन इस बीच झामुमो के कई सदस्य फिर से वेल में आ गये। जिसके कारण विधानसभा अध्यक्ष ने सभा की कार्यवाही को भोजनावकाश दोपहर दो बजे तक के लिए स्थगित कर दिया।
भोजनावकाश दोपहर दो बजे सदन की कार्यवाही फिर से शुरु होते ही झामुमो के कई विधायक वेल में आकर धरना पर बैठ गये। संसदीय कार्यमंत्री सरयू राय ने वर्ष 2016-17 के तृतीय अनुपूरक बजट व्यय विवरिणी में सम्मिलित अनुदान मांगों पर चर्चा का प्रस्ताव रखा, वहीं झाविमो के प्रदीप यादव ने कटौती प्रस्ताव रखा, लेकिन झामुमो सदस्यों के शोर-शराबे के कारण विधानसभा अध्यक्ष ने सभा की कार्यवाही को कल पूर्वाह्न 11 बजे तक के लिए स्थगित कर दिया।

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