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विकासः सरकारी तंत्र बनाम जनसहभागिता का मॉडल
सारंडा, सरयू व झुमरा प्लान के बजाय विकास भारती के मॉडल से जनता का सीधा जुड़ाव

रांची,9जून। खनिज संपदा से परिपूर्ण भारत के सबसे निर्धनतम झारखंड राज्य में विकास के मॉडल को लेकर देश भर के राजनीतिज्ञ, अर्थशाóी और समाजशाó के विशेषज्ञ चिंतित है। हाल के कुछ वर्षां में केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश लगभग हर एक-डेढ़ महीने में झारखंड का दौरा कर कभी सारंडा एक्शन प्लान, सरयू और झुमरा डेवलपमेंट प्लान को सरकारी तंत्र के जरिये धरातल पर उतारने के लिए प्रयासरत है, वहीं पिछले एक दशक से विकास भारती बिशुनपुर की ओर से गुमला, लातेहार और लोहरदगा के अलावा अन्य जिलों में आम लोगों से जुड़ कर विकास के लिए जनसभागिता का मॉडल पेश किया गया है, उसकी अनदेखी नहीं की जा सकती।
केंद्रीय मंत्री जयराम रमेश के विकास की रुपरेखा जहां सरकारी तंत्र का मॉडल साबित हो रहा है, जिसमें आम लोगों की सहभागिता कम नजर आ रही है और सरकारी अधिकारियों-कर्मचारियों तथा ठेकेदारों व बिचौलियों की भूमिका बढ़ गयी है। दूसरी तरफ विकास भारती के मॉडल में आम आदमी का सीधा जुड़ाव है, इस मॉडल में ग्रामीण महिलाएं और पुरुष अपने आर्थिक सशक्तीकरण और सरकारी कल्याणकारी योजनाओं का लाभ हासिल कर अपने जीवन स्तर को सुधारने के प्रयास में जुटे है। इस मॉडल से बड़ी संख्या में सिर्फ आदिवासी व अनुसूचिज जाति के लोगों का ही नहीं, बल्कि काफी संख्या में आदिम जनजाति समुदाय के लोगों की जीवनशैली भी बदलाव आया है।
हालांकि इस बात से भी नहीं कहा जा सकता कि जयराम रमेश के सारंडा, सरयू और झुमरा एक्शन प्लान से कोई फायदा नहीं हुआ है, जयराम रमेश की छवि आज राज्य में एक ऐसे राजनेता रुप में उभरी है, जो सही मायने में गरीब आदिवासियों के उत्थान और विकास को लेकर चिंतित है। सारंडा का इलाका एक ऐसा सुदूरवर्ती क्षेत्र है,जहां राज्य के भी जनप्रतिनिधि कम ही जाते है। यदि जनप्रतिनिधि जाते भी है, तो कुछेक प्रखंड व महत्वपूर्ण इलाके को छोड़ कर सुदूरवर्ती इलाकों में जाने से कतराते है, लेकिन जयराम रमेश ने अपने व्यस्ततम कार्यक्रमों में से समय निकाल कर सारंडा के कई ऐसे सुदूरवर्ती गांवों का दौरा किया,जहां अलग झारखंड राज्य बनने के बाद मुख्यमंत्री व मंत्र् भी जाने से हिचकते रहे हैं।
इन सबके बावजूद यदि विकास मॉडल की बात की जाए, तो जमीनी हकीकत को देखने से यह पता चलता है कि अब भी सारंडा एक्शन प्लान का फायदा पूरी तरह से आम लोगों को नहीं मिल पाया है। जयराम रमेश की इच्छाशक्ति से कुछ सड़कें जरुर बन गयी है, सेल, जिंदल, टाटा व खनन कार्य में लगी अन्य कंपनियों की ओर से इलाके में थोड़े बहुत सामाजिक उत्तरदायित्व के काम जरुर किये गये है, लोगों को सोलर लैंप, रेडिया, टार्च व साईकिल का वितरण किया गया, लेकिन अब भी एक बड़ी आबादी तमाम मूलभूत सुविधाओं से वंचित है। लौह अयस्क की खदानों से घिरी पहाड़ियों में रहने वाले सारंडा के गरीब आदिवासियों का जीवन स्तर अब भी ऊपर नहीं उठ पाया है। वर्षाें तक यह इलाका माओवादियों के लिए सुरक्षित स्थल के रुप में भी जाना जाता रहा, जिसके कारण सरकारी विकास योजनाओं का भी समुचित फायदा इलाके के लोगों को नहीं मिल पाया है। लेकिन गुमला व लातेहार के इलाके में विकास भारती बिशुनपुर के सचिव अशोक भगत और उनकी टीम के प्रयास से इलाके में रहने वाले गरीब आदिवासियों की जीवनशैली में निरंतर सुधार हो रहा है। विकास भारती की ओर से इन गरीब आदिवासियों को बड़ी आर्थिक सहायता या रोजगार नहीं उपलब्ध कराया गया, बल्कि सीमित संसाधनों में ही संस्था की ओर से लोगों को कौशल विकास के लिए प्रशिक्षण उपलब्ध करा कर स्वरोजगार के माध्यम से उनका आर्थिक सु॰ढ़ीकरण का प्रयास किया जा रहा है। इसके अलावा संस्था की ओर से कल्याणकारी योजनाओं का लाभ भी जरुरतमंदों तक पहुंचाने की कोशिश की जा रही है।
विकास भारती के सचिव अशोक भगत का कहना है कि 80 के दशक के प्रारंभ में जब वे गुमला-लातेहार के आसपास के क्षेत्रों में सामाजिक कार्यां की शुरुआत की, तो इलाके के लोगों का जीवन स्तर काफी निम्न था, लोगों के पास दो वक्त भोजन के लिए भी पर्याप्त साधन नहीं थे, आदिवासियों के पास जमीन तो उपलब्ध थे, लेकिन वे पैसे व तकनीकी सहायता के अभाव में खेती नहीं कर पा रहे थे। आदिम जनजातियों की स्थिति तो और भी दयनीय थे, वे कुंबा में रहते थे और जंगलों में शिकार कर अपने भोजन का इंतजाम करते थे। सड़कें नहीं थी, विशुनपुर व अन्य सुदूरवर्ती गांवों के ग्रामीणों का जिला मुख्यालय भी पहुंचना मुश्किल था। लेकिन आज स्थिति में बदलाव आया है। आदिवासियों के जीवनस्तर में थोड़ा सुधार हुआ है, अब तो आदिम जनजाति समुदाय के लोग भी खेती का कार्यकर गुजारा कर रहे है। लेकिन अब भी क्षेत्र के लोगों के उत्थान के लिए काफी कुछ किया जाना बाकी है।
’ए-टू-जेड’ डेवलपमेंट प्लान
रांची,9जून। गांव, समाज और व्यक्ति के उत्थान के लिए विकास भारती बिशुनपुर ने ’ए-टू-जेड’ डेवलपमेंट प्लान की रुपरेखा तय की है। संस्था की ओर से लोगों के आर्थिक सु॰ढ़ीकरण के लिए जहां कई तरह के प्रशिक्षण कार्यक्रमों को चलाया जा रहा है, वहीं किसानों को खेती के लिए आवश्यक तकनीकी व अन्य तरह की सुविधा भी उपलब्ध करायी जा रही है।
विकास भारती के सचिव अशोक भगत ने जब 1980 के दशक में गुमला, लातेहार व लोहरदगा के आसपास के इलाके में सामाजिक कार्यों की शुरुआत की, तो इलाके में गरीबी व तंगहाली को देखकर उनका मन काफी विचलित हुआ। आज की अपेक्षा तब इलाके में और अधिक गरीबी थी, लोगों के पास खाने के लिए दो वक्त का भोजन भी नहीं था और पहनने के लिए वó भी नहीं थे, यह देखकर अशोक भगत ने भी प्रण किया कि जब तक क्षेत्र्ा में सभी लोगों के पास पहनने के लिए कपड़े और दो वक्त भोजन के लिए पर्याप्त संसाधन उपलब्ध नहीं हो जाते है, तब तक वे सिला हुआ वó नहीं पहनेंगे,यह शपथ लेकर उन्होंने अपने पैंट-शर्ट को कोयल नदी की धार में बहा दिया और लगभग तीन दशक बीत जाने के बावजूद अब तक वे सिर्फ धोती पहन कर ही लोगों के साथ दुःख-दर्द बांटने की कोशिश कर रहे है।
अशोक भगत ने गुमला व लातेहार के सुदूरवर्ती क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के लिए अपने अन्य सहयोगियों के साथ मिलकर विकास भारती बिशुनपुर की स्थापना की। आज विकास भारती बिशुनपुर की ओर से ग्रामीण युवक-युवतियों को रोजगार उपलब्ध कराने के लिए कई तरह के प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाये जा रहे है, वहीं विकास भारती के सहयोग से बिशुनपुर में केंद्र सरकार के सहयोग से कृषि विज्ञान केंद्र की भी स्थापना की गयी है,जहां से किसानों को खेती के लिए तकनीकी सुविधा व अन्य आवश्यक जानकारियां उपलब्ध करायी जा रही है।
विकास भारती ने ग्रामीणों के आर्थिक सु॰ढ़ीकरण के लिए कई कार्यक्रमों की शुरुआत की है, जिसमें मधुमक्खी पालन, मुर्गी पालन, बत्तख पालन, बकरी पालन, सुअर पालन और गाय पालन के लिए किसानों को सहायता दी जा रही है। गुमला के बिशनपुर प्रखंड में चल रहे इन कार्यक्रमों के तहत ग्रामीण युवक-युवतियों को इस संबंध में पूरी जानकारी दी जाती है,ताकि उनका आर्थिक सु॰ढ़ीकरण हो सके।
संस्थान में महिलाओं व युवतियों के लिए सिलाई-कढ़ाई के लिए भी प्रशिक्षण की व्यवस्था की गयी है, जिसके माध्यम से प्रत्येक तीन और छह महीने के अंतराल में अलग-अलग बैच के माध्यम से सैकड़ों युवतियों व महिलाओं को प्रशिक्षित किया जा चुका है। प्रशिक्षण प्राप्त कर चुकी महिलाएं आज स्वरोजगार का रास्ता अपना कर आत्मनिर्भरता प्राप्त करने की दिशा में अग्रसर है। गांव की युवतियों के लिए नर्सिंग प्रशिक्षण की भी व्यवस्था की गयी है, जिसके माध्यम से ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराने का प्रयास किया जा रहा है। तीन महीने बाद प्रशिक्षण प्राप्त करने युवतियों को एक मेडिकल किट देकर उन्हें गांव वापस भेज दिया जाता है। अपने-अपने गांव वापस लौट कर प्रशिक्षण प्राप्त कर चुकी युवतियां ग्रामीणों से मामूली शुल्क लेकर जरुरत पढ़ने पर स्वास्थ्य सुविधा उपलब्ध कराने में मदद करती है। इसके अलावा संस्थान में महिलाओं के हस्तकरघा व क्राफ्ट का प्रशिक्षण दिया जाता है। बड़ी संख्या में महिलाएं व युवतियां बांस, मिट्टी व अन्य सामग्रियों से निर्मित वस्तुएं बनाती है, बाद में संस्था की ओर से इनके लिए बाजार की व्यवस्था की जाती है।
उद्य्नान व बागवानी के क्षेत्र में भी विकास भारती की ओर से आपार सफलता हासिल की गयी है। संस्था का बिशनुपुर के कई इलाके में बागवानी केंद्र है,जहां आधुनिक और जैविक खेती के माध्यम से पौधों को तैयार कर ग्रामीणों को उपलब्ध कराया जाता है। कई ऐसे जैविक पौधों को ढूंढ़ निकाला गया है,जो कम पानी में गर्मी के मौसम में भी हरियाली फैलाते है। इसके अलावा जैविक खेती को बढ़ावा देने के लिए केंचुआ खाद का भी उत्पादन किया जा रहा है।
आदिम जनजाति परंपरा को जीवित रखते हुए विकास भारती के प्रशिक्षण संस्थान में कई तरह की मूर्तियां बनायी जाती है। भगवान बिरसा मुंडा, चांद-भैरव, सिद्धो-कान्हू मुर्मू समेत अन्य शहीदों की मूर्तियों के अलावा कई सुंदर अल्मुनियम के बंटखारे (माप-तौल में प्रयुक्त आने वाला) तथा अन्य आकर्षक वस्तुएं तैयार की जा रही है।
संस्था में लोहे के गेट, शटर, खिड़ी के ग्रिल, बेड, भाषण स्टैंड, कुदाल, हसुआ, छोटी खुरपी समेत अन्य समान बनाने का भी प्रशिक्षण दिया जा रहा है।
विकास भारती ने युवाओं को कई अन्य माध्यमों से भी आत्मनिर्भर बनाने का प्रयास किया है। संस्था में कई तरह के जैम, आचार और सॉस बनाने का भी प्रशिक्षण दिया जा रहा है, जिसमें बड़ी संख्या में युवक-युवतियां काम में लगे है। विकास भारती में शताबर, अमरुद और अन्य तरह के जैम का उत्पादन दिया जा रहा है, वहीं ओल व आवंला तथा मिक्सड आचार बनाये जा रहे है। ग्रामीणों जंगल व आसपास के इलाके से एकत्र्ाित कर शताबर, आवंला, अमरुद, आम, जामुन समेत अन्य जरुरी चीज पहुंचाते है, बदले में उन्हें अच्छी कीमत मिलती है, जबकि आचार, जैम व सॉस आदि की पैकेजिंग कर इसे बाजार में बेचा जाता है। इस काम में बढ़ी संख्या में ग्रामीण जुटे है,जिससे उन्हें रोजगार के अवसर मिले है।
संस्था की ओर से बच्चों के लिए कई स्कूल व तकनीकी प्रशिक्षण केंद्रों की भी स्थापना की गयी है, वहीं हर्बल खेती को भी बढ़ावा दिया गया है।स्थानीय जड़ी-बुटियों की मदद से कई तरह की दवाओं का भी निर्माण कराया जा रहा है
बागवानी ने बदली गांव की तस्वीर
रांची,9जून। गुमला, लातेहार व लोहरदगा के कई गांवों में बागवानी की नयी तकनीक ने गांव की पूरी तस्वीर ही बदल दी है। बागवानी के बढ़ते रुझान ने एक ओर जहां खनन कार्य से हो रहे प्रदूषण को कम करने थोड़ी मदद की है, बागवानी से गांव के किसानों की तकदीर भी बदल रही है।
बागवानी का फायदा न सिर्फ आदिवासियों के विकास की तस्वीर को बदला है, बल्कि इसका फायदा आदिम जनजाति परिवार के सदस्यों को भी व्यापक रुप से मिला है। आज से आठ-दस वर्ष पहले जहां क्षेत्र में रहने वाले बिरहोर और बिरजियां आदिम जनजाति परिवार जीविका के लिए पूरी तरह से जंगल में शिकार व जंगली फल-फूल पर निर्भर थे, वहीं आज आदिम जनजाति परिवार के कई सदस्यों ने भी खेती व बागवानी का कार्य करने लगे है।
लातेहार जिले के नेटरहाट के निकट बहुआटोली गांव के रहने वाले आदिम जनजाति परिवार के सदस्य बिटन बिरजिया ने तीन-चार वर्षां के अल्पकाल में ही विकास भारती से मिले सहयोग से मेहनत बड़ी कामयाबी हासिल कर ली है। बिटन बिरजिया को आदिम जनजाति विकास योजना के तहत सरकार की ओर से जमीन उपलब्ध करायी गयी । बिटन बिरजिया को विकास भारती की ओर से नशपति के कई छोटे-छोटे पौधे और दो सुअर उपलब्ध कराये गये। बिटन ने अपने परिश्रम के माध्यम से कुछ ही वर्षां में आत्मनिर्भरता हासिल कर ली। आज बिटन मौसम में न सिर्फ नशपति को बेच रहा है, वहीं विकास भारती द्वारा बिरसा कृषि विश्वविद्य्नालय की मदद से उपलब्ध कराये गये दो सुअरों की मदद से आज वह दर्जनों सुअरों का पालन कर रहा है, बल्कि कई छोटे-छोटे सुअरों को बेचकर उनसे अच्छी आमदनी भी हासिल की है।
बिटन बिरजिया ने जैविक खेती के लिए केंचुआ खाद की तकनीक को भी अपनाया है। उसने अपने चंद संसाधनों में ही केंचुआ खाद के लिए तीन शेड का निर्माण कराया गया है,जिसमें विकास भारती की ओर से भी तकनीकी सहायता उपलब्ध करायी गयी है।
पुरानी पद्धति से बनेगा अशोक स्तंभ
रांची,9जून। सरकारी कार्यालयों के बाहर दिन-रात, धूप-बारिश और सर्दी-गर्मी के मौसम में राष्ट्रीय चिह्न के रुप में खड़े अशोक स्तंभ का निर्माण आधुनिक तकनीक से बने स्टील से नहीं होता है, बल्कि अशोक स्तंभ वर्षों-वर्ष बिना जंग लगे मजबूती के साथ टिके रहे, इसके लिए अब भी पुरानी पद्धति से बने अशोक स्तंभ का ही उपयोग किया जाता है।
पुणे की एक संस्था की ओर से विकास भारती बिशुनपुर को ही अशोक स्तंभ की जिम्मेवारी सौंपी गयी है। मलार आदिम जनजाति परिवारों द्वारा सदियों से पत्थर को पिघला कर लोहा बनाया जाता रहा है और इस लोहे में कार्बन का उपयोग नहीं होता और वर्षा तक पानी-धूप में रहने के बावजूद लोहे में जंग नहीं लगता। बिशुनपुर में भी मलार आदिम जनजाति के कई सदस्य पहले पुरानी पद्धति से आग की भट्ठी में गलाकर लोहा बनाने में जुटे है। मलार जाति के लोग पहले कड़ी मेहनत कर पहाड़ियों की चोटी से निकाल कर पत्थर को लाते है और फिर उसे आग की भट्टी में गलाकर लोहा बनाया जाता है। इस काम की देखरेख में जुटे पंकेज कुमार सिंह ने बताया कि एक किलोग्राम लोहा बनाने में करीब एक हजार रुपया खर्च आता है, वहीं एक अशोक स्तंभ बनने में लगभग एक लाख रुपये का खर्च आएगा।
सदियों पुरानी पद्धति से लोहा बनाने के बाद इसे अशोक स्तंभ के रुप में ढाला जाता है, बाद में सरकारी कार्यालयों के बाहर इसे स्थापित कराने के लिए मुहैय्या कराया जाता है। इस तरह से देश भर में इस्पात बनाने वाली कई बड़ी-बड़ी कंपनियां स्टील बना रही है, लेकिन देश के लिए राष्ट्रीय चिह्न अशोक स्तंभ बनाने का काम अब भी पुरानी पद्धति से आदिम जनजाति परिवार के सदस्यों की अहम भूमिका है।
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