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प्राचीन गौरव की तलाश

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रांची,28जून। अलग झारखंड राज्य गठन के बाद सूबे के विकास के लिए लगातार कई योजनाएं बनायी जा रही है,कई योजनाओं पर अमल भी शुरु कर दिया गया।राज्य के जनजातीय और आदिम जनजातियों की तस्वीर बदलने की कोशिश शुरु हुई, लेकिन हजारों करोड़ रुपए बहा दिए जाने के बावजूद अब तक स्थिति में कोई खास परिवर्त्तन नहीं हुआ है। विकास का लाभ राज्य के प्राचीन गौरवशाली इतिहास को समझने की जरुरत है और उसी के अनुरुप विकास को नई दिशा दिए जाने की जरुरत है,क्योंकि जिन राज्यों और देशों ने अपना सर्वांगीण विकास किया है, सबने पहले अपनी परिस्थितियों को समझा और फिर उसी के अनुरुप विकास की दिशा में कदम उठाये गए।
झारखंड का पौराणिक इतिहास सदियों पुराना रहा है और हिन्दुओं के प्राचीन ग्रंथ मनु संहिता में भी इसका जिक्र है, मनु संहिता में एक श्लोक है-
’अयस्कः पात्र्ो पयः पानम
शाल पत्र्ो च भोजनम्
शयनम खर्जूरी पात्र्ो
झारखंडे विधिवते।’
अर्थात झारखंड में रहने वाले धातु के बर्तन में पानी पीते है, शाल के पत्तों पर भोजन करते है और खजूर की चटाई पर सोते है। पुराण कथाओं में भी झारखंड का जिक्र है। वायु पुराण और विष्णु पुराण के अलावा महाभारत काल तथा चीनी यात्री फाह्यान , युआज च्यांग, ईरानी यात्री अब्दुल लतीफ, ईरानी धर्माचार्य मुल्ला बहबहानी के यात्रा वृतांतों में भी झारखंड का जिक्र विभिन्न नामों से किया गया है।
झारखंडवासियों के रहन-सहन, खान-पान, पहनावा, पारंपरिक रोजगार, कृषि पर निर्भरता अन्य क्षेत्रों से अलग है। कई पुरातात्विक उत्खनन में पत्थर और औजार प्राप्त हुए है तथा कई प्राकृतिक गुफाओं में मिले चित्र और शिलाखंड से इस बात की संभावना प्रबल होती है कि राज्य में आदिमानव निवास करते है। प्राचीन काल से क्षेत्र में आदिम जनजातीय और जनजातीय के रहने के साक्ष्य मिलते रहे है,ऐसी स्थिति में उनके विकास के लिए ऐसी योजना बनाए जाने की जरुरत है, जो उनकी मनोदशा के अनुरुप है और उसे वे कबूल कर सके है।
मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा ने भी पिछले दिनों एक कार्यक्रम में यह स्वीकार किया कि बिना अपने इतिहास को समझे हुए विकास की योजनाओं का समुचित लाभ नहीं मिल सकता है। राज्य में आदिम जनजातियों और जनजातीय समाज के विकास के पहले उनकी मनोभावना को समझना जरुरी है। आदिवासी अपने विकास योजनाओं के लिए किस तरह की पहल चाहते है, यह उनके पौराणिक इतिहास को समझे बिना संभव नहीं है। जबकि अलग राज्य बनने के बाद और इससे पहले एचईसी, टाटा कंपनी, बोकारो स्टील सिटी समेत अन्य कल-कारखाने लगने के बाद देश के अन्य हिस्सों से जो लोग यहां आकर बस गए, उनका विकास कैसे हो, इस पर भी अलग तरीके से विचार करना होगा, तभी सभी का सर्वांगीण विकास संभव है।

पर्यटन बन सकता है कि आर्थिक विकास का मुख्य आधार
पिठौरिया 400 वर्षाें तक बनी रही राजधानी
सिंगापुर, मलेशिया समेत विश्व के कई देश आज पर्यटन को ही विकास का मुख्य आधार बनाकर आर्थिक शक्ति के रुप में उभरने में कामयाबी हासिल की है, जबकि झारखंड में भी पर्यटन के विकास के क्षेत्र में असीम संभावनाएं है। झारखंड का इतिहास जहां एक ओर शहीदों की कुर्बानियों से भरा पड़ा है, वहीं दूसरी ओर ऐसे कई एतिहासिक स्थल है,जो वर्तमान में अपने अस्तित्व को बचाए रखने के लिए जद्दोजहद कर रहा है। ऐसा ही एक ऐतिहासिक स्थल राजधानी रांची से 16 किलोमीटर दूर रांची-कांके मार्ग पर पिठौरिया के नाम से स्थित है। इस स्थान पुरातात्विक और ऐतिहासिक महत्व है, जिसका यदि सही ढंग से संरक्षण और विकास किया जाए, तो यह अपना प्राचीन गौरव प्राप्त कर महत्वपूर्ण पर्यटन स्थल के रुप में विकसित हो सकता है। इसके विकसित होने से न सिर्फ झारखंड का सम्मान बढ़ेगा, बल्कि पर्यटकों के लिए यह विशेष आकर्षण का केंद्र बन सकता है और राज्य की आर्थिक स्थिति भी सु॰ढ़ हो सकती है। इस स्थल का ऐतिहासिक महत्व इस बात को लेकर है कि यहीं से आज से करीब 2000वर्ष पहले नागवंश के शासन का आरंभ होता है। यह क्षेत्र करीब 400 वर्षाें तक छोटानागपुर (वर्त्तमान झारखंड) की राजधानी बनी रही। यह क्षेत्र इतिहास का केंद्रबिंदु बना रहा,क्योंकि उस वक्त यह क्षेत्र हजारीबाग, बनारस और बंगाल को जोड़ने का एकमात्र रास्ता था, जो पगडंड़ियों और घने जंगलों से घिरा था।
1834 में रांची की स्थापना के पहले पिठौरिया ही उस वक्त की राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक क्षेत्र का केंद्रबिंदु था। 2000वर्ष पूर्व नागवंश शासन शुरु होने के पहले मुंडाओं का लोकतांत्रिक शासन प्रणाली बहाल था। पहली सदी में मंदरा मुंडा प्रधान मानकी थे, जिनका गढ़ पिठौरिया के बगल का क्षेत्र सुतियाम्बे बस्ती में था। इतिहासकारों का मानना है कि प्रधान मानकी मुंडा का निर्वाचन सर्वानुमति से होता था। पहले गांव में पाहन चुना जाता था, फिर 8-10 गांवों के राजनीतिक प्रमुख मिलकर पड़हा चुनते थे और बाद में सभी पड़हा आपस में मिलकर प्रधान मानकी चुनते थे, जिसे लोग अपना राजा मानते थे। लगभग 61 एकड़ क्षेत्र में फैले सुतियाम्बे के मुड़हर पहाड़ में मंदुरा मुंडा की कचहरी लगती थी,जहां लोगों की समस्याओं के अलावा राज-काज के कई विषयों पर चर्चाएं होती थी और निर्णय लिए जाते थे।
इस तरह पांच सौ से छह सौ ईसापूर्व आए मुंडा ही क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते थे। किदंवती है कि पहली सदी में बनारस से आए पंुडरीक नाग और पार्वती पूरी जाने के क्रम में पिठौरिया में ही रुके, उसी दौरान पार्वती को प्रसव पीड़ा हुई और उसने पुंडरीक नाग से उस सच्चाई का खुलासा करने का आग्रह किया, जो उसके मन में पहले से दबी थी। कहा जाता है कि पंुडरीक नाग को अपनी सच्चाई बताने के लिए मना किया गया था,क्योंकि अपनी वास्तविक पहचान बताने के बाद मनुष्य के रुप में उनका अस्तित्व समाप्त हो जाएगा। पत्नी पार्वती के बार-बार आग्रह करने के आगे वह बेवश हो गए और उन्होंने अपना असली चेहरा ’नाग’ के रुप में सामने ला दिया। बस फिर क्या था वे जैसे ही नाग के रुप में आए, वहां से उन्हें जाना पड़ा और निकट के ही अंधारी तालाब में समां गए। यही वह क्षण था,जब पार्वती ने एक पुत्र्ा को जन्म दिया,लेकिन जन्म देने के बाद ही वह नहीं बची। इसी दौरान युधिष्ठिर दूबे नामक उस बच्चे को देखा, जिस पर एक ’नाग’ उस बच्चे को छाया देने के लिए फन काढ़े हुआ था और अपनी पूंछ को उस बच्चे के मुंह में डाल दूध पिलाने का अहसास करा रहा था। युधिष्ठिर दूबे ने उस बच्चे को गोद में उठाया और उसे प्रधान मानकी मंदुरा मंुडा को सौंप दिया। उसी वक्त मंदुरा मुंडा की पत्नी ने भी एक बच्चे को जन्म दिया था, इस तरह दोनों बच्चों का लालन-पालन एक साथ होने लगा। पुंडरीक नाग का पुत्र बाद में फणिमुकुट राय के नाम से प्रसिद्ध हुआ और यहीं से नागवंश की शुरुआत मानी जाती है। इतिहासकारों का मानना है कि नागवंश का शासन यहां से अन्य क्षेत्रों में भी फैला। वर्त्तमान में रातुगढ़ के राजा इसी वंश की 66-68वीं पीढ़ी है।

धार्मिक-पर्यटन के रुप में मुड़हर पहाड़ का विकास संभव
रांची। सुतियाम्बे की गोद में लगभग 61 एकड़ क्षेत्र में फैला मुड़हर पहाड़ अपनी प्राकृतिक छटा को समेटे हुए आज भी लोगों के लिए आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। यह पहाड़ धार्मिक आस्था का भी प्रतीक बना हुआ है। पहाड़ के सबसे ऊपरी हिस्से में मुुड़हर बाबा विराजमान है, जिनका सिर शरीर से अलग है। इसी पहाड़ में अन्य देवी-देवताओं की प्रतिमाएं भी कुछ दूरी पर जगह-जगह स्थापित है। पहाड़ की सबसे ऊंची चोटी पर पहुंचने के बाद आसपास के क्षेत्रों का अदभूत नजारा देखने को मिलता है। यह स्थल पर्यटन के ॰ष्टिकोण से महत्वपूर्ण है ही, धार्मिक ॰ष्टिकोण से भी इसकी महत्ता कहीं अधिक है। धार्मिक मान्यताओं को माने तो यहां श्रद्धालु हर वैसे खुशी व पर्व के मौके पर आते है ,जहां वे अपनी मन्नतों को पूरा करने के लिए धार्मिक अनुष्ठान संपन्न करते है। यहां बकरे की बलि भी दी जाती है। इस मुड़हर पहाड़ के बारे में रुचि रखने वाले बताते है कि पहाड़ के बीचों-बीच गुफा के अंदर कुंआ है, जिसकी गहराई आज तक नहीं नापी जा सकी है। कहा जाता है कि इस गहराई को नापने के लिए एक बार प्रयास भी हुआ था, जिसमें सात खटियों की रस्सी लगी थी,लेकिन वास्तविक गहराई का पता नहीं लग पाया। मनोरम छटा बिखरेता यह पहाड़ आने-जाने वाले लोगों के लिए खासा आकर्षण का केंद्र बना है। लोग अपने जीवन के कुछ पल प्रकृति के साथ इस पहाड़ पर बिताने के लिए आते है,जहां उन्हें शांति और सुकून भी मिलती है। अगर इस पहाड़ को संरक्षित करने के साथ-साथ सजाया और संवारा जाए, तो यह एक पर्यटन स्थल के रुप में विकसित हो सकता है, सरकार को इससे राजस्व की भी प्राप्ति हो सकती है। इससे न सिर्फ ऐतिहासिक स्थल को संरक्षित करने का बल मिलेगा, बल्कि आने वाली पीढ़ी के लिए यहां के इतिहास को समझने में सहायता मिलेगी।
हालांकि पुरातत्व और पर्यटन विभाग द्वारा इस ओर ध्यान दिया गया है,कुछ कार्य भी हुए है,लेकिन इतना ही काफी नहीं है। इसे और भी विस्तार दिए जाने की जरुरत है,ताकि इस धरोहर को बचाया जा सके।

सदियों पहले शेरशाह ने पिठौरिया चौक के निकट की थी नमाज अदा
रांची। पिठौरिया चौक के निकट स्थित है ऐतिहासिक ईदगाह,जहां 16वीं सदी में तत्कालीन शासक शेरशाह सुरी ने बंगाल विजय के बाद लौटने के क्रम में नमाज अदा की थी।
इतिहासकार बताते है कि तत्कालीक शासक शेरशाह सुरी ने 16वीं शताब्दी में बंगाल के शासक महम्मूद शाह पर आक्रमण करने के लिए गौड़ लखनौती जाने के क्रम में ओल्ड बनारस रुट का उपयोग किया था,इसी क्रम में शेरशाह का मुख्य पड़ाव पिठौरिया बना था। उस वक्त शेरशाह ने अपने पुत्र जलाल खां को ख्वास खान के साथ बंगाल पर आक्रमण के लिए भेजा था और वह स्वयं पलामू होते हुए गौड़लखनौती पहुंचा था। 1534ई. में क्यूल नदी के तट पर सूरजगढ़ में महम्मूद शाह को पराजित कर शेरशाह ने बंगाल के एक बहुत बड़े भाग पर कब्जा जमाया था। बंगाल विजय के बाद लौटने के क्रम में शेरशाह ने पिठौरिया के निकट ईदगाह का निर्माण कराया था,जहां उन्होंने अपने सैनिकों के साथ नमाज भी अदा की।
यहां नमाज अदा की थी। वर्त्तमान में यह ईदगाह जीर्ण-शीर्ण अवस्था में है। कुछेक अवशेष अब भी बचे हुए है,लेकिन समय के साथ-साथ ईदगाह का अस्तित्व धीरे-धीरे समाप्त होता जा रहा है। ईदगाह के बगल में ही वर्त्तमान में एक चबुतरा बनाया गया है,जहां इस क्षेत्र्ा के मुस्लिम धर्मावलंबी नजाम अदा करते है। जानकार बताते है कि इस ईदगाह के विकास को लेकर वहां के मुस्लिम समाज में प्रयासरत है,लेकिन आपसी सहमति नहीं बन पा रही है। सरकार की ओर से भी ऐसा कोई पहल नहीं किया गया है, जानकार बताते है कि अगर सरकार इस दिशा में पहल करें, तो यह ईदगाह भी उन अन्य ऐतिहासिक धरोहरों की तरह पर्यटकों के लिए का आकर्षण का केंद्र बन सकता है, जिस तरह से आज देश में कई अन्य प्राचीनकाल की इमारतों व ऐतिहासिक स्थलों को महत्व प्राप्त है।

शहीदों की कुर्बानी व गद्दारों की दास्तां करता हैं बयां-पिठौरिया का किला
रांची। रांची के पिठौरिया स्थित वह ऐतिहासिक किला, जिसकी दीवारें अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ लड़ाई में कुर्बानी देने वाले शहीदों और गद्दारों की कहानी आज भी सुनाती है। यह किला परगनैत(राजा) जगतपाल सिंह की है। इसी किला के निकट बना एक फांसी घर है, जिसमें आजादी की लड़ाई लड़ने वाले दर्जनों शहीदों को अंग्रेजों के इशारे पर फांसी पर लटकाया गया था।
इतिहासकार बताते है कि राजा जगतपाल सिंह के दो पुत्र थे-राजा जयमंगल सिंह और जगदीश सिंह। इन्होंने अंग्रेज के खिलाफ हुए आंदोलन के दौरान अंग्रेजों की सहायता की थी और आजादी के दिवानों के साथ गद्दारी कर उन्हें मौत की नींद सुलाने का भी काम किया था। 1831ई. की बात है, उस वक्त सिंदराय और बिंदराय ने आदिवासी आंदोलन का नेतृत्व किया था। उस वक्त यहां की भौगोलिक स्थिति से अनभिज्ञ होने के कारण अंग्रेज अफसर विलकिंगसन युद्ध करने की स्थिति में नहीं थे, इसी समय पिठौरिया के राजा जगतपाल सिंह ने आंदोलनकारियों को दबाने में अंग्रेज की मदद की थी। उस वक्त के तत्कालीन गर्वनर जनरल विलियम वैंटिक ने मदद के बदले उन्हें 313 रुपए प्रतिमाह आजीवन पेंशन देने की घोषणा की थी। कहा जाता है कि राजा जगतपाल सिंह को अंग्रेजों ने किसी को भी फांसी पर लटकाने की छुट दे रही थी। पिता के नक्शेकदम पर चलते हुए उनके पुत्रों ने भी कुछ ऐसा कारनामा किया था। प्रथम स्वतंत्र्ाता संग्राम 1857 में क्रांतिकारियों को रोकने के लिए पिठौरिया घाटी की घेराबंदी की थी,ताकि क्रांतिकारी अपने मकसद में सफल न हो सके। इस राजा की गद्दारी की कहानी यहीं पर नहीं रुकती है, वे क्रांतिकारियों की हर गतिविधियों की जानकारी अंग्रेज तक पहुंचाते थे। राजा के प्रति नाराजगी इस कदर व्याप्त थी उस समय क्रांतिकारी ठाकुर विश्वनाथ नाथ शाहदेव ने उन्हें सबक सिखाने पिठौरिया पहुंचे और उनके किले को ध्वस्त कर दिया। बाद में वे गिरफ्तार हो गए और जगतपाल सिंह की गवाही के कारण उन्हें 16अप्रैल 1858 को रांची जिला स्कूल के सामने कदम्ब के वृक्ष पर फांसी पर लटका दिया गया। जानकार बताते है कि उनकी ही गवाही पर कई अन्य क्रांतिकारियों को भी फांसी पर लटकाने का काम किया गया।
जानकार यह भी बताते है कि जगतपाल सिंह को कई लोगों का श्राप भी लगा था और इसी श्राप का आज यह नतीजा है कि आज उनके वंश का खात्मा हो चुका है तथा प्रत्येक वर्ष किले का एक हिस्सा वज्रपात के साथ टूट जाता है। पिठौरिया के लोग इस किला को श्रापित किला के नाम से भी जानते है। अगर इस किला को भी संरक्षित करने का प्रयास सरकार द्वारा किया जाए, तो यह किला भी पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र तो बनेगा ही, साथ ही गद्दारी के परिणाम को जानने और समझने का मौका मिलेगा।

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