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लालबत्ती व पैसे का लोभ मिला, ठुकरा दियाःवीरेंद्र भगत
बचपन में झारखंड आंदोलन में कूदे, पूरा जीवन समर्पित, 9-10वर्षां तक रिक्शा चलाया,कई शाम भूखा सोना पड़ा,माटी-अस्मिता व खुदारी की लड़ाई मरते दम तक रहेगी जारी
अलग झारखंड राज्य आंदोलन के शुरुआती दौर में ही मार्टी-अस्मिता व खुदारी की लड़ाई की जंग में अपना सर्वत्र न्यौछावर करने वाले वीरेंद्र भगत को हटिया विधानसभा उपचुनाव में चुनाव लड़ने से रोकने के लिए कई तरह के प्रलोभन दिये गये, लालबत्ती व पैसे का लोभ दिया गया,लेकिन जनता से किये गये वायदे को पूरा करने के लिए उन्होंने सबकुछ ठुकरा दिया। निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर कैंची चुनाव चिह्न के साथ चुनाव मैदान में वीरेंद्र भगत की दमदार उपस्थिति से सभी हैरत में है। पेश है उनसे की गयी बातचीत का प्रमुख अंशः-
सवालः राजनीति में आने का फैसला कब व क्यों लिया?
वीरेंद्र भगतः-बचपन व छात्र जीवन में अलग झारखंड राज्य आंदोलन की शुरुआती दौर को देखा, गरीब आदिवासियों-मूलवासियों ,पिछड़ों और अल्पसंख्यकों की दयनीय स्थिति को देखा,लोगों के लिए संघर्ष करने की प्रेरणा मिली, समाज के दबे-कुचले व शोषित वर्ग ने मुझसे उम्मीद की, इसी जज्बे के साथ 1988 में झारखंड आंदोलन में कूद गया। अलग राज्य के लिए मोरहाबादी मैदान रांची में आयोजित सर्वदलीय रैली में पहली बार शिरकत करने का मौका मिला, इसके बाद कभी पीछे मुड़ कर नहीं देखा, लगातार अनंत संघर्षाें की राह पर चलने का सिलसिला शुरु हो गया। मानव सेवा, लोगों के सुख-दुःख में सहभागी बनने और एक अच्छा इंसान बनने का संकल्प मन में बैठ गया, यही कारण है कि प्रारंभ के 9-10वर्षा तक रिक्शा चलाया, कई शाम बिना अन्ना ग्रहण किये सो जाना पड़ा, लेकिन संघर्ष का जज्बा जिन्दा रहा।
सवालः जनता की किन समस्याओं और चुनावी मुद्दे के साथ मैदान में है?
वीरेंद्र भगतः अलग झारखंड आंदोलन की शुरुआत ही आदिवासियों के संवैधानिक अधिकारियों की रक्षा, दयनीय स्थिति से मुक्ति, विस्थापितों के पुनर्वास, सामाजिक समरसता कायम करने और झारखंडी अस्मिता की रक्षा के संकल्पों के साथ शुरु हुई थी। वर्ष 2000 में अलग राज्य बन गया, लेकिन अब भी लोगों की समस्या पूर्व की भांति ही विद्य्नमान है। आज भी संवैधानिक अधिकारियों की रक्षा नहीं हो पा रही है, गरीब आदिवासियों को जमीन से बेदखल किया जा रहा है, लोगों में आक्रोश है, उनकी आवाज को घर-आंगन में ताकत देने के लिए चुनाव मैदान में है। वर्षाे पुरानी समस्याओं के निदान के लिए लगातार प्रत्यनशील हूं।
सवालः एक ओर बड़ी-बड़ी राष्ट्रीय पार्टियां व क्षेत्रीय दल है, आप किन शक्तियों के सहारे निर्दलीय चुनाव मैदान में है?
वीरेंद्र भगतः वर्ष 2005 के विधानसभा में पहली बार निर्दलीय चुनाव मैदान में उतरा, जबकि 2009 के विधानसभा चुनाव में झारखंड मुक्ति मोर्चा का टिकट मिला, लेकिन उस वक्त भी झंडा-बैनर व पोस्टर तथा अन्य चुनाव सामग्रियों की कमी थी, सिर्फ अपने साथ चलने वाले युवाओं, ग्रामीणों व आम लोगों का साथ था, आज भी उपचुनाव में यही स्थिति चुनाव सामग्रियों की दिक्कत है। बड़े राजनीतिक दलों और क्षेत्रीय पार्टियों के धन-बल आगे वे कुछ भी नहीं है। वर्ष 2005 में भी जब पहली बार युवराज गोपाल शरणनाथ शाहदेव से उनका मुकाबला हो रहा था, उस वक्त भी एक ओर राजा भोज और दूसरी ओर गंगू तेली वाली कहावत चरितार्थ हो रही थी। दूसरी बार भी यही स्थिति रही, इसके अलावा भी धन-बल के सहारे के कई अन्य प्रत्याशी चुनाव मैदान में थे, इस बार भी यही स्थिति है।
सवालः उपचुनाव में आप अन्य प्रत्याशियों से किस तरह से खुद को अलग पाते है?
वीरेंद्र भगतः उपचुनाव के पहले चुनाव मैदान में उतरने से रोकने के लिए कई तरह के प्रलोभन दिये गये, लालबत्ती और पैसे का प्रलोभन दिया गया, लेकिन मैंने सारे प्रलोभनों को ठुकरा दिया। जनता सबकुछ देख रही है। जिन लोगों के लिए अपने घर-दरवाजा, पेड़-खालिहान छोड़ दिया, उनके लिए कभी अपनी ईमानदारी से समझौता नहीं कर सकता हूं। राजनीति में रहकर भी इमानदारी, नीति-सिद्धांतों व अपने वसूलों पर अडिग रहने के लिए ॰ढ़संकल्पित हूं। कुछ भी हो जाए, समझौतावादी नहीं बनना चाहता। जब समाज के लिए संघर्ष का रास्ता चुना, तो घर में अभिभावकों ने समझा कि बेटा उद्दंड हो गया है, घर-बार छोड़कर वर्षाें तक रिक्शा चलाकर पेट पालना पड़ा, लेकिन इसके बावजूद जब भी लोगों के लिए थोड़ा बहुत कुछ कर पाता हूं, तो खुशी होती है। काम हो जाने के बाद लोग दारु-हड़िया पीने का दावत देते है, लेकिन आज तक कभी इन चीजों को हाथ नहीं लगाया, मुर्गा-मांस खाने के लिए बुलाते है, उससे भी दूर रहा, कुछ पैसा देना चाहते है, लेकिन पैसा भी नहीं लेता, क्योंकि पैसा ले लेने के बाद उसमें सेवा भाव नहीं रह जाएगा।
सवालः झामुमो ने टिकट नहीं दिया, ऐन मौके पर निर्दलीय चुनाव लड़ने का निर्णय लेना पड़ा, गुरुजी (शिबू सोरेन) से कितनी नाराजगी है?
वीरेंद्र भगतः दिशोम गुरु शिबू सोरेन सर्वमान्य नेता है, पिछली बार पार्टी सिंबल दिया, इस बार भी चुनाव लड़ाने का भरोसा दिलाया था, नामांकन प्रक्रिया शुरु हो जाने पर जब अपने समर्थकों के साथ गुरुजी से मिलने पहुंचे,तब भी उन्होंने चुनाव लड़ने की तैयारी करने का निर्देश दिया और कहा वे खुद भी चुनाव प्रचार में आएंगे, लेकिन इस बीच राज्यसभा चुनाव हुआ, किसी से कोई बात नहीं छिपी है, किन परिस्थितियों में झामुमो उम्मीदवार की जीत हुई। उपचुनाव में टिकट के मसले पर झामुमो कोर कमेटी की बैठक हुई, कोर कमेटी ने चुनाव में तटस्थ रहने का फैसला लिया।
सवालः विरोधियों द्वारा यह आरोप लगाया जाता है कि आप सिर्फ एक खास वर्ग के लोगों को लेकर साथ चल रहे है?
वीरेंद्र भगतः एकदम गलत बात है, (चुनावी कार्यालय में मौजूद दर्जनों कार्यकर्त्ताओं से एक-एक कर नाम पूछते है) कहते है उनके साथ ही वर्ग,जाति और धर्म के लोग साथ है। चुनाव में खड़े प्रतिद्वंदियों की ओर से इस तरह का भ्रम फैलाने की कोशिश की जा रही है। किसी भी जाति, धर्म-संप्रदाय का व्यक्ति हो, मुसीबत में जब भी उन्हें कोई आवाजदेता है, तो बेटा-भाई बनकर उनके घर के आंगन में खड़ा रहता हूं। कभी किसी चीज का लोभ नहीं रहा, सारा जीवन समाज को समर्पित रहा, हड़िया-दारु, मांस-मछली से दूर रहा और कभी पैसे का लाभ नहीं रहा, पूरा जीवन सार्वजनिक संघर्ष का रहा। मुझे जानने वाले सभी लोग इन बातों को समझते है, इसलिए हर वर्ग का समर्थन मिल रहा है।
सवालः चुनाव लड़कर किस तरह का सामाजिक-राजनीतिक बदलाव लाने की मंशा है?
वीरेंद्र भगतः झारखंडियों को उनका संवैधानिक अधिकार मिलें, पांचवीं अनुसूची के तहत मिले अधिकारों को सख्ती से लागू किया जाए, समता जजमेंट लागू हो, स्थानीयता की नीति बने, विस्थापितों की समस्याओं का समाधान हो, इन्हीं सब मुद्दों को लेकर संघर्षरत हूं और धीरे-धीरे इन लक्ष्यों के पूरा हो जाने पर सामाजिक-राजनीतिक बदलाव नजर आने लगेगा।
सवालः भविष्य की राजनीति की क्या योजना है?
वीरेंद्र भगतः जिन मुद्दों को लेकर चुनाव मैदान में हूं और गरीब आदिवासियों व वंचितों के जिन सवालों को आवाज देने की कोशिश कर रहा हूं, आगे भी और प्रखर होकर इन दायित्वों को निभाता रहूंगा और जनसमर्थन मिलने के बाद लोगों की स्थिति बदलेगी, पूरा समाज खुशहाल बने, यह कोशिश निरंतर जारी रहेगी।
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