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हार-जीत अलग बात,इतिहास दोष न दें,इसलिए चुनाव मैदान में उतरा हूंःगौंझू
अमेरिका के रेड इंडियनों की तरह झारखंडियों को समाप्त करने की साजिश

झारखंडी भाषा-संस्कृति के परिचायक और शिक्षाविद् डॉ. रामदयाल मुंडा के शिष्य रहे डॉ. गिरिधारी राम गौंझू भी इस बार हटिया विधानसभा उपचुनाव में झारखंड दिशोम पार्टी (जेडीपी) उम्मीदवार के रुप में चुनाव मैदान में है। उनका कहना है कि चुनाव में हार-जीत अलग बात है, इतिहास दोष न दें, इसलिए चुनाव मैदान में उतरा हूं। रांची विश्वविद्य्नालय में जनजातीय एवं क्षेत्र्ाीय भाषा विभाग के विभागाध्यक्ष रहे डॉ. गिरिधारी राम गौंझू आशंका व्यक्त करते है कि अमेरिका के रेड इंडियनों की तरह झारखंडियों को भी समाप्त करने की साजिश की जा रही है। पेश है उनसे बातचीत के प्रमुख अंशः-
सवालः आप शिक्षाविद, लेखक, बुद्धिजीवी रहे, अचानक राजनीति में आने का निर्णय क्यों लिया?
गौंझूः- वर्षां तक क्षेत्रीय और जनजातीय भाषा विभाग में पढ़ाने के बाद यह अनुभव हुआ कि 1980-81 में जिन उद्देश्यों को लेकर जनजातीय भाषा विभाग की स्थापना की गयी थी, उसका उद्देश्य सिर्फ अब तक पूरा नहीं हुआ है। 32वर्षां में भी झारखंड की जनजातीय और क्षेत्र्ाीय भाषा की पहचान नहीं बन पायी है। विभाग के स्थापना का उद्देश्य था कि पहले युवक-युवतियों कजनजातीय और क्षेत्रीय भाषा की समुचित जानकारी उपलब्ध करा दी, ताकि बाद में इस विभाग से निकले छात्र-छात्राएं प्राथमिक स्कूलों, माध्यमिक स्कूलों और इंटर कॉलेज में जाकर छोटे-छोटे बच्चों को उनकी मातृ भाषा में शिक्षा मुहैय्या कराने का काम कर सके,क्योंकि आज भी ग्रामीण और जनजातीय समाज में यह बात देखने को मिलती है कि बच्चें अपने माता-पिता व अभिभावक से अपनी मातृभाषा में बोलना सीख जाते है, लेकिन वहीं बात जब उन्हें हिन्दी या अंग्रेजी में बतायी जाती है, तो वह ठीक से समझ नहीं पाते है, इस तरह सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले गरीब बच्चे लगातार पिछड़ते चले जाते है और युवा होने तक उन्हें पूर्ण शिक्षा नहीं मिल पाता, जिसके कारण ही आज समाज में भटकाव की स्थिति है। दुनिया भर के शिक्षाशाóी भी मानते है कि मातृभाषा में ही शिक्षा देने से बच्चों का समुचित विकास संभव है, लेकिन इस दिशा में सरकार की ओर से अब तक पर्याप्त कदम नहीं उठाये गये है। मातृ शिक्षा की बात को दूर है, ग्रामीण क्षेत्रों के सरकारी स्कूलों में बच्चों को ठीक से अंग्रेजी, गणित और विज्ञान विषय की भी शिक्षा नहीं मिल पाती है,क्योंकि इन स्कूलों में इन विषयों के शिक्षकों की नियुक्ति जरुर होती है,लेकिन बाद में वे तबदला करवा कर शहरी क्षेत्र्ा में आ जाते है। शिक्षा के क्षेत्र में सरकार के उदासीन रवैये को देखते हुए मैंने चुनाव में उतरने का निर्णय लिया।
सवालः किन मुद्दों को लेकर चुनाव लड़ रहे है?
गौंझूः झारखंडी अस्मिता की रक्षा और गरीब दबे-कुचले लोगों की आवाज को बल देने के लिए जब संघर्ष का निर्णय लिया, तो इसी क्रम में विस्थापन, सीएनटी-एसपीटी एक्ट को सख्ती लागू करवाने और स्थानीयता की नीति तथा खनिज की लूट रोकने के लिए संघर्ष कर रहे झारखंड दिमोश पार्टी के अध्यक्ष सालखन मुर्मू के संपर्क में आये। झादिपा झारखंडी भाषा-साहित्या और कला-संस्कृति की समृद्धि तथा युवाओं को रोजगार दिलाने तथा जंगल के विनाश को मुद्दे को लेकर संघर्षरत है। इसी मुद्दे पर चुनाव लड़ रहे है और झारखंडी हितों की रक्षा की चाह रखने वाले लोगों का समर्थन मिल रहा है।
सवालः झारखंड और खासकर हटिया विधानसभा क्षेत्र्ा के विकास के प्रति आपकी परिकल्पना क्या है?
गौंझूः पूरे राज्य में पलायन, मानवाधिकार का हनन, विस्थापन, जमीन से बेदखली और बेरोजगारी की गंभीर समस्या है। भाषा-सहित्य, कल-संस्कृति, वन-खान सभी समाप्त हो रहे है। राज्य के मूल निवासी अपने आपको असुरक्षित अनुभव कर रहे है, लोगों को अपना भविष्य अंधकारमय नजर आ रहा है, राज्य में शिक्षा माफियाशिक्षा बेच रहे है, सरकारी शिक्षा केंद्र इतने उपेक्षित, शिक्षक विहीन, सुविधाहीन हैं कि सरकार का कोई भी मुलाजिम चपरासी, किरानी, अफसर, सांसद, विधायक और मंत्री तक अपने बच्चों को वहां पढ़ाते तक नहीं है, यही हाल सरकारी अस्पतालों का है, तब इसकी जरुरत क्या है? लोगों को जब इसका सही फायदा ही नहीं मिल पा रहा है, तब इतनी बड़ी राशि खर्च किसके लिए की जा रही है। पूरे राज्य की समस्या से हटिया भी अलग नहीं है, हटिया विधानसभा क्षेत्र भी इन्हीं समस्याओं से जूझ रहा हैं। सरकारी स्कूलों, कॉलेज और विश्वविद्य्नालयों में शिक्षक की कमी हैं। जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा विभाग में पिछले 15वर्षाें से शिक्षक सेवानिवृत्त हो रहे है, इनकी जगह आज तक एक भी शिक्षक की बहाली नहीं हुई है। 2007 में व्याख्याताओं के लिए जेपीएससी (झारखंड लोक सेवा आयोग) से साक्षात्कार लिया गया,लेकिन इन पांच वर्षाें में इसकी नियुक्ति तक नहीं हुई है। विभाग की स्थिति यह है कि मंडारी, कुड़ूख और नागपुरी भाषा को छोड़ कर अन्य जनजातीय और क्षेत्रीय भाषा के शिक्षक नहीं है। सिर्फ ही शिक्षा नहीं, बल्कि पानी, बिजली और सड़क की समस्या से लोग त्रस्त है। आज भी आदिम युग में जीने वाले आदिम जनजाति के लोग झारखंड में मौजूद है। झारखंड को बचाना है, जंगल बचाना है, खान-खनिज बचाना है, यहां रहने वालों को बचाना है, यहां की भाषा-संस्कृति को बचानी है, इन्हीं सब परिकल्पनाओं और मुद्दों को लेकर चुनाव मैदान में है।
सवालः झारखंडी सभ्यता-संस्कृति की रक्षा चुनावी मुद्दा क्यों नहीं बन पाया?
गौंझूः-अस्मिता व सभ्यता-संस्कृति की रक्षा की बात सभी करते है, लेकिन इसके बावजूद यह चुनावी मुद्दा नहीं बन पाता,क्योंकि यहां के गरीब आदिवासी और मूलवासी अशिक्षित है। लोग अपने बच्चों की पढ़ाई के लिए अच्छे शिक्षक ढूंढते है, इलाज के लिए अच्छे डॉक्टर के पास जाते है, वर या कन्या ढूंढ़ते है, तब भी अच्छा वर-कन्या खोजते हैं। लेकिन चुनाव में जाति, धर्म, भाषा, क्षेत्र्ा, गोत्र्ा और पैसा तथा अन्य लालच सामने आ जाता है। जबकि राजनीति एक पवित्र्ा सेवा हैं, जिसे बदनाम कर दिया है। चुनाव में लाखों-करोड़ों रुपये गंदी नाली के पानी की तरह बहा दिये जाते हैं। इतनी रकम से उस इलाके में अस्पताल, छात्रावास, सभा भवन, जलाशय, अखरा आदि लोक हित में बनाए जा सकते हैं। पर चालाक लोग दो मछली दे देंगे, पर तालाब नहीं बताएंगे, दो पैसे देंगे, पर बुद्धि नहीं देंगे। धर्म ग्रंथों में, महाभारत और कुरान शरीफ में भी लिखा है, बिना छल-प्रपंच के बेशुमार दौलत कमाई नहीं जा सकती, जो चुनाव में पूंजी लगाता है, वह जीतने पर अपनी पूंजी का सौ गुणा वापस पाने का प्रत्यत्न करता है। वह जनहित नहीं देख पाता। जरुरत है,ऐसे प्रतिनिधि की, जो जनता की आवाज समय पर और सही जगह रख सके।
सवालः चुनाव लड़ने का फैसला कब,टिकट कैसे मिला?
गौंझूः 24 मई को झादिपा के अध्यक्ष सालखन मुर्मू से रांची में पत्र्ाकारों ने हटिया उपचुनाव में उम्मीदवार के संबंध में पूछा, तो उन्होंने चुनाव लड़ने की घोषणा कर बात को टाल दी। पत्रकारों के जाने के बाद उम्मीदवार की तलाश शुरु हुई, किसी ने साहित्यकार वीपी केशरी को उम्मीदवार बनाने का सुझाव दिया,लेकिन फिर बताया गया कि पिछले दिनों राज्यसभा चुनाव के दौरान उनका नाम आने पर केशरी ने चुनाव लड़ने पर अनिच्छा जाहिर की, जिसके बाद सालखन मुर्मू ने उनसे संपर्क किया। 25 मई को नामांकन दाखिल करने की अंतिम तिथि थी। मैंने चुनाव लड़ने से इसलिए इंकार नहीं किया गया कि कम से कम लोग यह तो नहीं कहेंगे चुनाव में उन्हें एक बुद्धिजीवी उम्मीदवार नहीं मिला। लोकतंत्र्ा में वोट डालने के लिए लोग स्वतंत्र है, अक्सर बुद्धिजीवियों की ओर से कहा जाता है कि चुनाव मैदान में कोई अच्छा उम्मीदवार नहीं है, यह सोचकर नामांकन दाखिल कर दिया।
सवालः हटिया विधानसभा उपचुनाव में आपका चुनाव प्रचार किस तरह से चल रहा है और आपको किन लोगों से उम्मीद है?
गौंझूः मेरा चुनाव कला-संस्कृति से जुड़े सामाजिक कार्यकर्त्ता और उनके पढ़ाये विद्य्नार्थी लड़ रहे है। इसके अलावा शिक्षाविद्, बुद्धिजीवी और झारखंडी अस्मिता की रक्षा से जुड़े लोगों की कितनी ताकत है, इसका अंदाजा लग पाएगा। चुनाव परिणाम चाहे, जो भी हो, इतिहास कभी यह दोष तो नहीं देगा कि प्रयास नहीं किया गया। हालांकि देश का इतिहास रहा है कि यहां फूलन देवी और किन्नर चुनाव जीत जाते है, लेकिन डॉ0 रामदयाल मुंडा जैसे शिक्षाविद् चुनाव हार जाते है। झारखंडी भाषा,संस्कृति एवं संस्कृति की लगातार उपेक्षा होती रही है, अमेरिका के रेड इंडियनों की तरह झारखंडवासियों को समाप्त करने की साजिश चल रही है, यहां रहने वाले आदिवासियों और मूलवासियों को सचेत होने की जरुरत है।
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