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टूटते मकान, छलकते आंसू, जज्बातों का कत्ल

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रांची,16अप्रैल। अतिक्रमण हटाओ अभियान में पिछले एक महीने से गरीबों के आशियानों के टूटने का सिलसिला जारी है, वहीं शहर के विभिन्न संकरी गलियों और चौक-चौराहे को अतिक्रमण खड़ी बड़ी-बड़ी इमारते अब भी मौजूदा व्यवस्था को मुंह चिढ़ाने का काम रही है, जबकि गरीबों का प्रतिनिधि टूट रहा है। प्रशासन के बुलडोजर से न सिर्फ गरीबों का मकान टूट रहा है। उनका न सिर्फ आशियाना ही उजड़ रहा है, बल्कि उनकी जज्बातों का भी कत्ल हो रहा है, उनके उन सपनों का भी खून हो रहा है,जिसने कभी यह सपना देखा था कि उस घर में उनके बच्चे पढ़-लिखकर बड़े होंगे और फिर एक अच्छा मकान बनाकर शांति से जीवन व्यतित करेंगे। पर ऐसा हो न सका, जिस मकान को बनाने में उस व्यक्ति ने अपने जीवन भर की कमाई लगा दी थी, प्रशासन के बुलडोजर ने पल भर में उसे ध्वस्त कर दिया। ध्वस्त न सिर्फ उनका मकान हो गया, बल्कि अब ध्वस्त हो गयी उनके जीवन जीने की इच्छा और लालसा।
राजधानी रांची के कचहरी चौक के निकट र्मााे ट में सुबह दस-ग्यारह बजे तक सब कुछ सामान्य था, हालांकि प्रशासन की ओर से जिन दुकानदारों को नोटिस दिया गया था, उनमें भय और दहशत का माहौल था, सभी अपने बचे-खुचे सामान को हटाने में जुटे थे, इसी बीच अपराह्न 12 बजे के बाद प्रशासन का बुलडोजर पहुंचता है, साथ में आते है बड़ी संख्या में पुलिसकर्मी। नागाबाबा खटाल और इस्लामनगर बस्ती में प्रशासन के खिलाफ आवाज बुलंद करने का नतीजा लोग देख चुके थे,इसलिए कहीं से कोई विरोध का स्वर नहीं उठता है। बुलडोजर चलना शुरु हो जाता है और कुछ ही क्षणों में लगभग डेढ़ सौ मकान ध्वस्त हो जाता है, बचता है सिर्फ वहां मलवा, शेष रह जाता है सिर्फ ऐसा मंजर, जो यह बताता है कि कुछ देर पहले वहां कोई प्राकृतिक आपदा या भूकंप नहीं आया, बल्कि उन्हीं रहनुमाओं ने उन्हें उजाड़ दिया, जिन्होंने करीब 40वर्षाें पहले उन्हें उस स्थान पर बसाया था। इन्हें उजाड़ने वाले को शायद यह आभास न था कि वर्षाें पहले कैसे इन गरीबों ने अपने खून-पसीने की कमाई से इस छोटे से आशियाने को खड़ा किया था, कहां से खपड़ा लाया, कहां से ईंट लायी, कहां से लायी गयी बालूू-छर्री और जरुरत की छोटी-बड़ी सामानें। कैसे धूप में खड़े होकर, बरसात में भींग कर अपनी आजीविका चलाने के लिए चार गुणा छह, पांच गुणा आठ या इससे भी छोटी जगहों में अपनी जिन्दगी को संवारने की कोशिश की गयी, इसकी पीड़ा उनकी समझ से परे है, जिन्होंने कभी इन कठिनाईयों से गुजरने की जहमत ही नहीं उठायी।
बुलडोजर ने न सिर्फ गरीबों की खुशियों के उन क्षण को छीन लिया, जिसकी बदौलत आज वे अपने बच्चों की पढ़ाई-लिखाई और पेट पालने की व्यवस्था करने में समर्थ थे, बल्कि उस इच्छाशक्ति पर भी कुठाराघात किया गया, जिस मन ने कभी अच्छा नागरिक बनने का सपना पाला था। बुलडोजर चलता रहा, महिलाएं अपनी छाती पिटती रही, स्कूल से लौटा बच्चा अपने मकान की तलाश में जुटा, लेकिन बुलडोजर ने न सिर्फ उस बच्चे के मन में मौजूदा व्यवस्था के खिलाफ बगावत के बीज को बोने का काम किया, बल्कि उन बच्चों की मां के दिल से निकली आह जोरदार आवाज के साथ गिरती इमारतों में दब गयी। इस सच्चाई से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि इस विभत्स मंजर को देखकर सभी की आंखें नम थी,यहां तक कि सड़कों से गुजरने वाले लोग भी कुछ देर के लिए दिल थाम कर उन पीड़ितों के लिए दुआएं करते नजर आ रहे थे, जिनपर बुलडोजर का कहर गिर रहा था। बुलडोजर चलाने वाले चालक का भी दिल कांप रहा था,लेकिन वह अपने कर्त्तव्यों व आदेश के पालन के मजबूर था। बुलडोजर चलाने की देख-रेख में लगे पुलिसकर्मी, दंडाधिकारी और अन्य अधिकारी भी इस ह्रदय विदारक ॰श्य को देख कर खामोश थे,लेकिन उनका भी अंदर ही अंदर जरुर रो रहा था, वे सिर्फ यही प्रार्थना कर रहे थे, जल्दी से जल्दी काम पूरा हो जाए और इस काम से उसे छुटकारा मिल सके।
आधुनिक, लोकतांत्र्ािक और लोककल्याणकारी राज्य में जीवन का यह दुःखद ॰श्य शहर के एक स्थान तक ही सीमित नहीं है, विभिन्न हिस्सों में रहने वाले हजारों उन लोगों के आंखों में भी यही दर्द झलक रहा है, जिन्हें प्रशासन की ओर से मकान खाली करने और अतिक्रमण को ध्वस्त करने का नोटिस पहले मिल चुका है। संवेदनशीलता मर चुकी है या फिर तथाकथित सभ्य समाज के कर्त्ता-धर्त्ता जानबूझ कर आंखें किए हुए है, यह तो समय ही बताएगा।

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