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एक वर्षों से ग्रामीणों ने नहीं सुनी नक्सलियों के पदचाप की आहट
सारंडा में बदलाव की बयार बही, नक्सली खौफ से उबरने के बाद विकास की चिंता
सारंडा (झारखंड),27जनवरी।देश भर में प्रतिबंधित नक्सली संगठन भाकपा-माओवादियों के लिए सबसे सुरक्षित क्षेत्र् माने जाने वाले सारंडा के इलाके में इन दिनों जबर्दस्त बदलाव नजर आ रहा है, नक्सली हिंसा के बजाय अब क्षेत्र में विकास को प्राथमिकता दी जाने लगी है।
एशिया के सबसे घने जंगल में चिह्नित पश्चिम सिंहभूम जिले के सारंडा के ग्रामीण अब लोकतांत्र्ािक व्यवस्था के माध्यम से विकास की मुख्यधारा में शामिल होने के लिए प्रतिबद्ध नजर आ रहे है। सारंडा क्षेत्र्ा के सर्वाधिक उग्रवाद प्रभावित क्षेत्र मनोहरपुर के गांगटी पंचायत के एक ग्रामीण लाखिन्दर चांपिया ने बताया कि एक वर्षाें से गांव के लोगों ने रात में नक्सलियों के पदचाप की आहत नहीं सुनी। उन्होंने बताया कि पिछले एक दशक से उग्रवादियों के कारण इलाके में विकास कार्य पूरी तरह से ठप्प रहा, क्षेत्र में विकास का कोई काम नहीं हो पाया। उन्होंने बताया कि गांगटी पंचायत दो पहाड़ों के बीच अवस्थित है। एक वर्ष पहले नक्सली रात की चांदनी में कोल्हान पहाडी से सारंडा पहाड़ की ओर हथियारों के साथ बेफौफ आते-जाते थे, लेकिन पता नहीं क्यों एक वर्ष से माओवादियों की पदचाप ग्रामीणों को सुनने को नहीं मिल रही है। लाखिन्दर चांपिया ने इस पर संतोष व्यक्त करते हुए नक्सली खौफ से उबरने के बाद ग्रामीण अब वर्ष में दो बार फसल उपजाने की कोशिश कर रहे है, पहले एक फसल ही मुश्किल से हो पाता था, लेकिन धीरे-धीरे विकास की योजनाएं गांव में पहुंचने लगी है।
चांपिया ने यह भी जानकारी दी कि एक वर्ष पहले अक्सर ग्रामीण गांव में मानकी-मुंडा के पास आते थे और रात में खाना-पीने की व्यवस्था की मांग करते थे, जिसके बाद गांव के प्रत्येक घर से चावल व अन्य खाद्य्नान्न एकत्र्ाित कर माओवादियों के खाने-पीने की व्यवस्था की जाती थी।
गौरतलब है कि सारंडा के उग्रवाद प्रभावित क्षेत्र्ाों में पिछले वर्ष सुरक्षाकर्मियों की ओर से ऑपरेशन ग्रीन हंट चलाया गया। महीनों तक चलाये गये इस ऑपरेशन के बाद यह इलाका पूरी तरह से नक्सलियों से मुक्त करा लेने का दावा किया गया है। ऑपरेशन के बाद इलाके में नक्सली वारदात की संख्या में नगण्य हो गयी है, इसके बावजूद कुछेक घटनाओं ने क्षेत्र्ा में माओवादियों की उपस्थिति का अहसास कराने का काम किया है।
माओवादियों का मुक्त एरिया, अब भय मुक्तःजयराम
दीघा में चिता जले, सारंडा में अंतिम संस्कार हो
माओवादियों के लिए पिछले एक दशक से अधिक समय तक मुक्त क्षेत्र बन चुके सारंडा का इलाका अब लोगों के लिए भय मुक्त क्षेत्र बन चुका है, यह लोकतंत्रा की बहाली और मजबूती का प्रतीक है। यह कहना है कि केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्ाी जयराम रमेश का।
केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्राी जयराम रमेश 26जनवरी को अति उग्रवाद प्रभावित क्षेत्र्ा रहे पश्चिमी सिंहभूम के मनोहरपुर प्रखंड मुख्यालय से करीब 50 किमी दूर दीघा पंचायत मुख्यालय में आयोजित झंडोत्तोलन समारोह के बाद उपस्थित जनसमूह को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि अलग झारखंड राज्य बनने के बाद 12 वर्षों के बाद भी इस क्षेत्र्ा का समुचित विकास नहीं हो पाया, पूरा इलाका उग्रवादियों के लिए मुक्त क्षेत्र्ा के रुप में जाना जाता था, लेकिन अब यह क्षेत्र्ा पूरी तरह से भय मुक्त हो चुका है, यह लोकतंत्र्ा के लिए सुखद है। जयराम रमेश ने कहा कि उनकी यह इच्छा है कि मरने के बाद उनकी चिता दीघा गांव में ही जले और अंतिम संस्कार सारंडा में हो तथा उनका नाम जयराम रमेश की जगह जयराम रमेश मुंडा रख दिया जाए।
केंद्रीय मंत्र्ाी ने कहा कि 26जनवरी को केंद्रीय मंत्र्ाी या तो नई दिल्ली में होते है या फिर राज्यों की राजधानी रांची में मौजूद रहते है, लेकिन उन्होंने गणतंत्र्ा दिवस सारंडा में इसलिए मनाने का निर्णय लिया,क्योंकि वर्षों बाद यहां लोकतंत्र्ा की वापसी हुई है। उन्होंने कहा कि माओवादियों का खात्मा और लोकतंत्र्ा में आमजन का विश्वास पैदा होने से क्षेत्र्ा में विकास कार्याें की गति में तेजी आएगी।
दीघा पंचायत चुनाव में राष्ट्रीय ध्वज फहराने और ग्रामीणों से सीधे संवाद करने के बाद केंद्रीय मंत्र्ाी हेलीकॉप्टर से मनोहरपुर प्रखंड मुख्यालय पहुंचे,जहां उन्होंने एक मेगा नेत्र्ा शिविर का उदघाटन किया। इस शिविर में करीब एक हजार लोगों के नेत्र्ा का इलाज किया गया और उन्हें मुफ्त दवाईयां उपलब्ध करायी गयी। बाद में जयराम रमेश मनोहरपुर प्रखंड से करीब 35 किमी दूर गंगदा पंचायत पहुंचे। वहां मनरेगा पंचायत भवन मैदान में आयोजित एक समारोह को संबोधित करते हुए जयराम रमेश ने कहा कि वे झारखंड से सांसद, विधायक, प्रमुख या अन्य जनप्रतिनिधि नहीं है, लेकिन सारंडा के लोगों की आवाज को बुलंद करना चाहते है। स्थानीय ग्रामीण युवक-युवतियों द्वारा बिजली की मांग को लेकर हाथों में पोस्टर लेकर केंद्रीय मंत्र्ाी का ध्यान आकृष्ट कराने पर जयराम रमेश ने प्रसन्नता व्यक्त करते हुए कहा कि यह लोकतंत्र्ा का पहचान है, आम लोगों को यही रास्ता अपनाना चाहिए,क्योंकि नक्सलियों का रास्ता हिंसा, आतंकवाद, धमकी, गोली, हत्या, अत्याचार का है, लोकतंत्र्ा का रास्ता इंसानियत का है, संविधान पर विश्वास करते हुए लोग अपनी बातों को सरकार के समक्ष रखे, चुनाव में हिस्सा लें। उन्होंने कहा कि लोग अपनी बातों को सरकार के समक्ष जोर-शोर से उठाये, विभिन्न माध्यमों से उठाये, सरकार आम लोगों के लिए है, जबकि जंगल की सरकार तो अपने फायदे के लिए काम करती है।
उन्होंने कहा कि सारंडा में अच्छी सड़कें बनी है, 11 में से दो सड़कों का निर्माण कार्य पूरा हो चुका है, 9 अन्य सड़कों का निर्माण कार्य अभी बाकी है। 60 हजार से अधिक इंदिरा आवास लोगों को उपलब्ध कराये जाएंगे, सोलर लाइट, ट्रांजिस्टर ग्रामीणों को उपलब्ध करा दिये गये है। कुंओं का निर्माण कार्य चल रहा है। सारंडा क्षेत्र्ा में सिंचाई की छोटी-छोटी सुविधाएं उपलब्ध होने से एक के बजाए अब लोग साल में दो-दो फसल उपजा रहे हैं, महिलाओं में नई जागृति आयी है, महिलाओं की आवाज बुलंद हुई है। उन्होंने कहा कि इलाके में बिजली नहीं है, इस बात को वे प्रधानमंत्र्ाी तक पहुंचएंगे। जयराम रमेश ने ग्रामीणों को यह भी भरोसा दिलाया कि अगली बार तब वे गंगाटी गांव आएंगे, तो बिजली का तार होगा और घरों में बिजली से बल्ब जलता देखना चाहते है।
केंद्रीय मंत्र्ाी ने ग्रामीणों का आह्नान किया कि वे जुलूस-प्रदर्शन व अन्य आंदोलनों के माध्यम से अपनी बातों को प्रशासन व सरकार के समक्ष पहुंचएं, इसी रास्ते से उनकी समस्याओं का समाधान हो सकता है, लेकिन माओवाद का रास्ता किसी ॰ष्टिकोण से ठीक नहीं है, नक्सली बच्चों के शत्र्ाु है, बच्चों को बंदूकों उठाने के लिए विवश कर रहे है, यह गलत रास्ता है। उन्होंने कहा कि सरकार आमजन के लिए है, सरकार काम नहीं करती है, तो जवाबदेह बनाने के लिए दबाव बनाये, बीडीओ के पीछे तब तक भागते रहे, जब तक उनकी समस्याओं का समाधान न हो जाता है।
जयराम रमेश ने कहा कि वे ग्रामीणों की हर समस्याओं के समाधान में सहयोग देंगे, लेकिन ग्रामीणों से भी यह वादा चाहते है कि वे गांव में पूरी तरह से नशा मुक्त बनाएं और घर-घर में शौचालय हो, ताकि महिलाओं को शौच के लिए बाहर नहीं जाना पड़ा। उन्होंने इस अभियान में महिलाओं से आगे आने की अपील की। उन्होंने कहा कि सरकार नक्सल अभियान के लिए कार्रवाई कर सकती है, विकास योजनाओं का चलाने के लिए आर्थिक मदद कर सकती है, लेकिन नशामुक्ति और घर में शौचालय बनाने के लिए ग्रामीणों को खुद ही पहल करनी होगी।
नक्सलियों का खौफ कम हुआ, मच्छरों व हाथियों के आतंक से दहशत कायम
पूरी कमेटी के साथ आते हैं हाथी, एक हाथी मकान तोड़ता है, शेष हाथी सुरक्षा घेरा बनाये रखते हैं

सारंडा में ऑपरेशन ग्रीन हंट के बाद माओवादियों का खौफ निश्चित रुप से कम हुआ है, लेकिन अब भी इलाके में मच्छरों और हथियों के आतंक से दहशत कायम है।
पश्चिमी सिंहभूम जिले के मनोहरपुर प्रखंड मुख्यालय से करीब 40 किमी दूर गांगटी पंचायत के ग्रामीण बगराई सिद्धू और दुला चांपिया ने बताया कि गांव में मलेरिया का प्रकोप सिर्फ बरसात में ही नहीं, सालों पर मच्छरों का प्रकोप नजर आता है। उन्होंने बताया कि जाड़े के मौसम में भी कई ग्रामीणों को मलेरिया हो जाता है, लेकिन गांव में न तो कोई प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र है या चिकित्सक की सुविधा है। इलाके में खनन कार्य कर रही कंपनियों के कुछ प्रतिनिधि सप्ताह में दो बार पंचायत भवन में आते है और ग्रामीणों को दवाईयां दे जाते है, जबकि गंभीर रुप से बीमार लोगों को गांव से करीब 20 किमी दूर चिरिया माइंस स्थित सेल के अस्पताल में ले जाना पड़ता है, जिसमें भारी कठिनाईयों का सामना करना पड़ता है।
हाथियों के आतंक के संबंध में दुला चांपिया का कहना है कि हाथी पूरी कमेटी के साथ आते हैं, हाथियों के झुंड में कई छोटे-बड़े, नर-मादा हाथी शामिल होते है। उन्होंने बताया कि गांव में हमला करने वाले हाथी पूरी योजनाबद्ध तरीके से काम करते है, एक हाथी किसी मकान या खेत को नुकसान पहुंचाता है या किसी ग्रामीण को कुचल कर मार डालने की कोशिश करता है, तो उस हाथी को झुंड के साथ आये अन्य हाथी पूरी तरह से सुरक्षा घेरा बना कर घेर लेते है, जिससे ग्रामीणों द्वारा तीर चलाने या नुकसान पहुंचा रहे हाथी को चोट पहुंचाने की सारी कोशिश बेकार हो जाती है। ग्रामीणों द्वारा चलाया गया तीर यदि किसी हाथी के शरीर में घुस भी जाता है, तो उससे हाथियों को कोई ज्यादा नुकसान नहीं पहुंचता है, बल्कि हाथ और गुस्सैल हो जाते है और पहले से ज्यादा नुकसान पहुंचाते है।
ग्रामीणों का कहना है कि हाथियों के आतंक से निजात दिलाने के लिए वन विभाग की ओर से कोई खास सहायता नहीं दी जाती, यदि किसी मकान या खेत को नुकसान पहुंचता है या कोई ग्रामीण घायल हो जाता है अथवा मौत हो जाती है, तब भी समय पर प्रशासन की ओर से मदद नहीं मिल पाती है। कई बार तो सरकारी लालफीताशाही के कारण नुकसान की भरपाई में भी विभिन्न तरह का अड़चन पहुंच जाने के कारण लोगों को सरकारी योजनाओं का लाभ नहीं मिल पाता।
सेल, टाटा, जिंदल व अन्य कंपनियों की ओर से सहायता
लौह अयस्क क्षेत्र्ा से घिरा सारंडा के विभिन्न मांगों में खनन कार्य में जुटी निजी कंपनियों टाटा व जिंदल के अलावा सार्वजनिक क्षेत्र्ा की प्रतिष्ठान भारतीय इस्पात प्रधिकरण (सेल) की ओर से समय-समय पर अपनी जिम्मेवारियों का निर्वहन किया जा रहा है।
सेल, टाटा और जिंदल की ओर से समय-समय पर विभिन्न गांवों में स्वास्थ्य शिविर का आयोजन किया जाता है, वहीं नियमित रुप से ग्रामीणों को दवाईयां व अन्य मेडिकल सुविधाएं उपलब्ध करायी जाती है। गांगटी पंचायत के एक ग्रामीण दुला चांपिया ने बताया कि इन कंपनियों की ओर से प्रत्येक गुरुवार और शुक्रवार को गांव के पंचायत भवन में आकर आवश्यक दवाईयां उपलब्ध कराी जाती है, कई बार ग्रामीण तो मलेरिया व मामूली बुखार समेत अन्य छोटी बीमारियों के लिए पहले से ही दवाईयां ले कर सकते है,ताकि जरुरत पड़ने पर इसका उपयोग किया जा सके।
हालांकि ग्रामीण इस बात से अनजान नजर आये कि क्षेत्र्ा में खनन कार्य के बदले इन कंपनियों की यह स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध करायी जा रही है। अधिकांश ग्रामीणों को तो इस बात की भी जानकारी नहीं है कि इलाके में कौन-कौन सी कंपनियां खनन कार्य में लगी है। हालांकि जब ग्रामीण गंभीर रुप से बीमार पड़ जाते है, तो मानकी-मुंडा के आवेदन पत्र्ा पर हस्ताक्षर के बाद ही उन्हें स्थानीय अस्पताल में भर्त्ती कराया जाना संभव हो पाता है। कोई ग्रामीण सीधे जाकर निजी कंपनियों के अस्पताल में इलाज नहीं कराया जा सकता है।
दूसरी तरफ सार्वजनिक प्रतिष्ठान सेल की ओर से काफी हद तक बेहतर तरीके से अपने सामाजिक उत्तरदायित्वों का निर्वहन किया जा रहा है। सेल की ओर से ट्रांजिस्टर, सोलर लाईट , टार्च व अन्य जरुरी सामान घर-घर हर परिवार को उपलब्ध कराया गया है,यही कारण है कि सदियों से अंधेरा रहने के बावजूद कुछ ही घंटे सही, बिजली की रौशनी पहुंच पायी है।
हथियार की जगह हाथों में तख्तियां, विकास को लेकर जागे ग्रामीण
एशिया ही नहीं दुनिया के सबसे घने जंगल सारंडा की तलहटी में बसे गांवों के ग्रामीणों ने वर्षाें बाद नक्सलियों के चंगुल से मुक्ति पाने के बाद अब हथियारों की जगह हाथों में तख्तियां नजर आ रहा है, जिसमें विकास की चिंता साफ झलक रही है।
केंद्रीय ग्रामीण मंत्र्ाी जयराम रमेश जब सारंडा के गांगदा पंचायत पहुंचे, तो ग्रामीणों ने हाथयों में तख्तियां लेकर बिजली उपलब्ध कराने की मांग को लेकर उनका ध्यान आकृष्ट कराया। जयराम रमेश अन्य राजनेताओं की तरह प्रदर्शन कर रहे ग्रामीणों पर झल्लाने के बजाये, उनका खुलेदिल से स्वागत किया। केंद्रीय मंत्र्ाी ने कहा कि उनके प्रदर्शन का वे स्वागत करते है। उन्हांेने इस प्रदर्शन को लोकतांत्र्ािक व्यवस्था का आदर करार दिया। उन्होंने हाथों में तख्यिता लंकर प्रदर्शन कर रहे ग्रामीणों को अपने नजदीक बुलाया और कभी माओवादियों के गढ़ रहे ग्रामीणों के नजदीक पहुंच गये। उन्होंने कहा कि यही अपनी मांगों को मनवाने के लिए लोकतंत्र्ा में यही सबसे कारगार कदम है, उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार हो या राज्य सरकार, सब उनकी सरकार है, यदि सरकार बातें नहीं सुनती है, तो इसके लिए इन्हीं लोकतांत्र्ािक माध्यमों से दबाव बनायी जाए, उन्होंने कहा कि यदि अधिकारी उनकी बातें नहीं सुनते है, तो पीछे पड़ जाय और जब तक उनकी बातें नहीं सुनी जाए, तब तक उनके पीछे लगे रहे।
जयराम रमेश ने कहा कि गांव में बिजली, सड़क और पानी उनकी बुनियादी जरुरत है, यह उनका अधिकार है, सरकार व प्रशासन के लिए यह उपलब्ध कराना जिम्मेवारी है, जब तक उनकी मांगें पूरी नहीं हो, इसी तरह का आंदोलन जारी रहे। उन्होंने इस दौरान कई युवकों को गले से भी लगाया, जबकि महिलाओं से गांव के विकास में सहयोग की अपील की।
जयराम ने ग्रामीणों के समक्ष रखी दो शर्तें-
नशामुक्त गांव बने, हर घर में शौचालय बने
गणतंत्र्ा दिवस पर सारंडा के विभिन्न इलाकों के भ्रमण पर आये केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्र्ाी जयराम रमेश ने ग्रामीणों के समक्ष दो शर्त्तेें रखी। उन्होंने कहा कि वे विकास और आधारभूत संरचना उपलब्ध कराने में हर सहयोग के लिए तैयार है, लेकिन ग्रामीणों को भी इसके बदले दो वायदा करना होगा।
जयराम रमेश के मुख से की दो शर्ताेें की बातकर ग्रामीणों ने हर वायदा पूरा करने का भरोसा दिलाया। इस पर केंद्रीय मंत्र्ाी ने कहा कि वे चाहते है कि गांव नशामुक्त बने और हर घर में शौचालय बनें। उन्होंने कहा कि नशा मुक्त गांव से ही गांव का विकास संभव है, जबकि हर घर में शौचालय की सुविधा को उन्होंने महिलाओं का मौलिक अधिकार बताया। उन्होंने कहा कि यह महिलाओं के आत्मसम्मान से जुड़ा मसला है और इसमें महिलाओं को ही आगे बढ़ कर काम करना होगा, क्योंकि गांव में नशामुक्ति अभियान भी महिलाओं की ॰ढ़ता से ही संभव है, जबकि शौचालय के लिए केंद्र सरकार हरसंभव सहायता देने को तैयार है।
उन्होंने सभा में मौजूद कुछ ग्रामीणों से अपील की कि वे गांव में नशामुक्ति अभियान के लिए कमान संभालें, क्योंकि सारंडा इलाके की विशेष बात यह है कि इलाके में महिलाएं ही काम करती है , जबकि पुरुष सदस्य तो दोपहर बारह बजे से ही दारु-हड़िया पीने बैठ जाते है।
गुरुजी की इच्छा नशामुक्त हो गांव
केंद्रीय मंत्र्ाी जयराम रमेश ने झारखंड मुक्ति मोर्चा प्रमुख शिबू सोरेन का जिक्र करते हुए कहा कि गुरुजी की भी यही तमन्ना है कि राज्य का हर गांव नशामुक्त बने। उन्होंने कहा कि शिबू सोरेन ने संताल इलाके में बड़े पैमाने पर नशामुक्ति अभियान चलाया और आदिवासी इलाकों में जनजागरुता पैदा करने का प्रयास किया। उन्होंने इस क्षेत्र्ा में भी गुरुजी के अभियान को सफल बनाने की अपील की।
सारंडा में लोकतंत्र्ा की वापसी, विकास के रास्ते की ओर बढ़ाःजयराम

सारंडा (झारखंड),27जनवरी।केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्र्ाी जयराम रमेश ने सारंडा में 26 जनवरी को तिरंगा फहराने के बाद कहा कि इलाके में लोकतंत्र्ा की वापसी हुई, माओवाद का खात्मा हुआ है और अब पूरे इलाके में विकास की ललक देखी जा रही है।
मनोहरपुर के गांगदा गांव में एक कार्यक्रम में हिस्सा लेने के बाद जयराम रमेश ने विशेष बातचीत में बताया कि हाल के दिनों में स्थिति में बदलाव आयी है, लेकिन नक्सल प्रभावित सारंडा की सीमा अन्य उग्रवाद प्रभावित क्षेत्र्ाों से सटे रहने के कारण क्षेत्र्ा में माओवादी गतिविधियों पर पूरी तरह से अंकुश लगाने के लिए आधारभूत बुनियादी ढांचा उपलब्ध कराने की आवश्यकता पर बल दिया।
उन्होंने कहा कि सारंडा में विकास की पहल की वजह से नक्सली घटनाओं में कमी जरुर आयी है, लेकिन सड़क, पुल-पुलियों और अन्य ढांचागत विकास जरुरी है। उन्होंने बताया कि सारंडा का 25 प्रतिशत क्षेत्र्ा पड़ोसी राज्य उड़ीसा की सीमा से सटा हुआ है, यही हाल गढ़वा व पलामू तथा लातेहार के उग्रवाद प्रभावित क्षेत्र्ाों की भी है। इस इलाके की सीमा भी पड़ोसी राज्यों से सटी है। उन्होंने कहा कि नक्सल प्रभावित क्षेत्र्ाों में केंद्र सरकार की ओर से दो-तीन राज्यों को मिलाकर एक साथ बुनियादी ढांचा उपलब्ध कराने व विकास योजनाएं चलाने की बात कही।
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