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झारखंड के इन 5 दिग्गज राजनेताओं ने बिहार की राजनीति को नयी दिशा प्रदान किया
एकीकृत बिहार में अपने प्रभाव से पक्ष-विपक्ष की राजनीति में दमदार उपस्थिति दर्ज करायी
रांची। 15 नवंबर 2000 के पहले अलग झारखंड राज्य भी एकीकृत बिहार का हिस्सा था। आजादी के बाद से देश की राजनीति को बिहार के राजनेताओं ने भी काफी प्रभावित किया, वहीं बिहार की राजनीतिक परंपरा और विरासत को आगे बढ़ाने में झारखंड के भी कुछ राजनेताओं ने महत्वपूर्ण भूमिका निभायी। अभी बिहार विधानसभा चुनाव की राजनीतिक सरगर्मी चरम पर है, इस चुनावी माहौल में कुछ पल के लिए पीछे मूड़कर देखने से यह जानकारी मिलती है कि एकीकृत बिहार में अपने प्रभाव से पक्ष-विपक्ष की राजनीति में झारखंड के रहने वाले कुछ दिग्गज राजनेताओं ने दमदार उपस्थिति दर्ज करायी। बिहार में छोटानागपुर-संतालपरगना के रूप में पहचाने जाने वाले इस हिस्से अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत कर इन पांच नेताओं ने बिहार ही नहीं, बल्कि पूरे देश की राजनीति में अपनी महत्वपूर्ण छाप छोड़ी
कामाख्या नारायण सिंह ने कांग्रेस को दी चुनौती-बने नेता प्रतिपक्ष
आजादी के बाद देश जब पूरे देश में कांग्रेस का बोलबाला था, तब रामगढ़ स्टेट के राजा बहादुर कामाख्या नारायण सिंह ने बिहार में कांग्रेस के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती के रूप में बनकर उभरे। 1952 से लगातार 1970 तक लगातार वे बिहार विधानसभा के सदस्य रहे। छोटानागपुर-संतालपरगना के साथ ही बिहार के भी कुछ हिस्सों से एक साथ चुनाव जीतने वाले वह एकाकी नेता थे। बिहार में 1962 ई. तक उनकी पार्टी के छोटानागपुर संताल परगना जनता पाटी के 7 सांसद हो गये और 50 विधायकों के साथ बिहार विधानसभा में विपक्ष के नेता के रूप में मान्यता मिली। बिहार में 1967 से 68 तक पहली गैर कांग्रेस सरकार गठन में भी उनकी भूमिका काफी महत्वपूर्ण रही।
पं.विनोदानंद झा का बिहार पंचायती राज कानून अन्य राज्यों के लिए पथ प्रदर्शन बना
बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री रहे पंडित विनोदानंद झा का कार्य क्षेत्र भी झारखंड रहा। 1937 में बिहार विधानसभा के लिए निर्वाचित पं. विनोदानंद झा 1946 से 1952 तक स्थानीय स्वशासन मंत्री नहे। 1957 में वे राजमहल से विधानसभा सदस्य निर्वाचित रहे और 1961 में मुख्यमंत्री बने। 1963 में कामराज योजना के तहत उन्होंने मुख्यमंत्री पद से त्यागपत्र दे दिया और बाद में 1971 में वे दरभंगा लोकसभा क्षेत्र के लिए निर्वाचित हुए। उन्होंने बिहार सरकार के स्थानीय स्वशासन मंत्री की हैसियत से बिहार पंचायती राज कानून 1947 का निर्माण किया था,जो देश के अन्य राज्यों के लिए पथ-प्रदर्शक सिद्ध हुआ। बिहार में 12 हजार ग्राम पंचायतों का विधिवत संगठन किया जा चुका था। 1959 में जब विनोदानंद झा पुनः स्थानीय स्वायत शासन विभाग के मंत्री बने, तो उन्होंने उसी वर्ष संघटित बलवंत राय मेहता समिति की अनुशंसाओं के आधार पर सत्ता के विकेंद्रीकरण और ग्राम, प्रखंड तथा जिला स्तरों पर त्रिस्तरीय प्रशासन व्यवस्था को कार्यान्वित करने का प्रयास किया। इसी के फलस्वरूप बिहार पंचायत समिति तथा जिला परिषद अधिनियम 1961 का निर्माण विधिवत किया गया। प्रारंभ में यह कानून भागलपुर, रांची और धनबाद जिलों में प्रयोगात्मक रूप से क्रियान्वित किया गया और क्रमशः इसका विस्तार राज्य के अन्य जिलों में भी किया गया।
कृष्ण बल्लभ सहाय देश में जमींदारी उन्मूलन के सूत्रधार बने
बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री कृष्ण वल्लभ सहाय का कार्य क्षेत्र भी झारखंड का गिरिडीह जिला ही रहा। 1952 में वे पहली बार गिरिडीह से बिहार विधानसभा के लिए निर्वाचित हुए और श्री बाबू मंत्रिमंडल में राजस्व मंत्री बने। 2 अक्टूबर 1963 से 5 मार्च 1967 तक वे बिहार के मुख्यमंत्री रहे। कृष्ण बल्लभ सहाय को देश में जमींदारी उन्मूलन का सूत्रधार माना जाता है। आजादी के तुरंत बाद अंतरिम सरकार में राजस्व मंत्री की हैसियत से के.बी.सहाय ने जमींदारी प्रथा उन्मूलन के लिए कानून बनाया। इस कानून को बिहार एक्ट 1950 के नाम से जाना जाता है। इस कानून ने पूरे बिहार के जमींदारों में हड़कंप मचा दिया। इस कानून को प्रभावी बनाने के लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू द्वारा संविधान में पहला संशोधन किया गया। इस संशोधन के तहत अनुच्छेद 14 को निश्तेज करने के लिए संविधान में अनुच्छेद 31(ए) और 31 (बी) जोड़ा गया। 1955 में भू हदबंदी विधेयक पेश किया गया और इसे संशोधित रूप से 1959 में स्वीकार किया गया। 1962 में इसे राष्ट्रपति की स्वीकृति प्राप्त हुई।
चतुरानन मिश्र देश में वृद्धावस्था पेंशन व फसल बीमा के व्यवस्था जनक
बिहार की राजनीति में कद्दावर राजनेता के रूप में करीब छह दशक तक सक्रिय रहे वामपंथी राजनेता चतुरानन मिश्र को देश में वृद्धावस्था पेंशन व्यवस्था के जनक के रूप में जाना जाता है। इनका कार्य क्षेत्र भी झारखंड के गिरिडीह-हजारीबाग रहा। 1969 से 1980 तक वे तीन बार गिरिडीह से विधानसभा चुनाव जीते। 1977 में उन्होंने चतुरानन मिश्र हजारीबाग लोकसभा क्षेत्र से वामपंथी उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़े, लेकिन चुनाव हार गये। बाद में संगठन में मजबूत पकड़ की वजह से उन्हें 1984 में राज्यसभा भेज दिया गया। 1990 में भी वे दुबारा राज्यसभा के लिए चुने गये। 1996 में वे मधुबनी से निर्वाचित हुए और संयुक्त मोर्चा सरकार में एचडी देवेगौड़ा और आई.के.गुजराल के प्रधानमंत्रित्व काल में वे कृषि मंत्री बने। कृषि रहने दौरान उनके द्वारा देश में पहली बार राष्ट्रीय फसल बीमा योजना की शुरुआत हुई, जबकि विधायक रहते हुए उन्होंने वृद्धावस्था पेंशन का प्रस्ताव बिहार विधानसभा में रखा था।
बिन्देश्वरी दूबे मजदूर आंदोलन के समर्थ नेता
बिहार में मार्च 1985 से फरवरी 1988 तक मुख्यमंत्री रहे बिन्देश्वरी दूबे का कार्य क्षेत्र भी झारखंड का हजारीबाग-बेरमो रहा। मजदूर आंदोलन के समर्थ नेता रहे बिन्देश्वरी दूबे ने हजारीबाग जिले के बेरमो को अपना कार्य क्षेत्र बनाया और श्रमिक आंदोलन में कूद पड़े। अत्यंत अल्प अवधि में बिन्देश्वरी दूबे मजदूर आंदोलन के समर्थ नेता के रूप में उभकर सामने आये और इंडियन नेशनल ट्रेड यूनियन, इंटक के अध्यक्ष पद पर आसीन होकर जो उल्लेखनीय कार्य किये, वे इतिहास के अध्याय बन गये। भारत छोड़ो आंदोलन से स्वातंत्रता आंदोलन में कूद पड़ने वाले बिन्देश्वरी दूबे को 1952 के प्रथम आम चुनाव में कांग्रेस ने बेरमो विधानसभा के लिए अपना उम्मीदवार घोषित किया। 1952 से लेकर मृत्युपर्यंत वे विधानसभा, लोकसभा और राज्यसभा सदस्य के रूप में निर्वाचित हुए और बिहार के मुख्यमंत्री के रूप में भी अपनी विशिष्ट पहचान छोड़ी। वे 1952, 1962, 1967, 1969, 1972 और 1985 में बेरमो विधानसभा से निर्वाचित हुए। इस बीच 1980 में वे गिरिडीह से लोकसभा के लिए निर्वाचित हुए और केंद्र में मंत्री बने। इससे पहले वे बिहार सरकार में भी 1972 से 77 तक मंत्री भी रहे। करीब तीन वर्षां तक मुख्यमंत्री रहने के दौरान बिन्देश्वरी दूबे ने मजदूरों के हित में कई उल्लंखनीय कार्य किये।
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