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भूमि अधिग्रहण एक्ट 1894 में संशोधन बिल मॉनसून सत्र में
नगड़ी समेत अन्य जगहों पर भूमि अधिग्रहण को लेकर उत्पन्न कठिनाईयों को दूर करने का प्रयास
रांची,17जुलाई। झारखंड में खनन कार्याें ,शैक्षणिक संस्थानों और उद्य्नोग लगाने के लिए भूमि अधिग्रहण को लेकर उत्पन्न कठिनाईयों ने राज्य सरकार के समक्ष कई मुश्किलें खड़ी कर दी है। अभी रांची के समीप नगड़ी में केंद्रीय शैक्षणिक संस्थानों के लिए जमीन अधिग्रहण के मसले पर सरकार बुरी तरह से घिर चुकी है, वहीं सीएनटी (छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम) के मसले पर पिछले दिनों झारखंड उच्च न्यायालय के आदेश के बाद भी सरकार के समक्ष परेशानी खड़ी हुई है। इसके अलावा पेसा कानून के तहत पंचायती राज संस्थाओं को भूमि अधिग्रहण को लेकर व्यापक अधिकार देने के उद्देश्य से मौजूदा कानून में संशोधन की जरुरत महसूस की गयी है।
विधि विभाग ने इन्हीं परिस्थितियों में भूमि अधिग्रहण एक्ट 1894 में संशोधन के लिए झारखंड राज्य विधि आयोग से परामर्श मांगा है। राज्य सरकार सवा सौ साल पुराने एक्ट में संशोधन लाना चाहती है, इसके लिए विधानसभा में विधेयक लाए जाने की भी तैयारी की जा रही है। प्राप्त जानकारी के अनुसार विधि आयोग ने भी अंग्रेजों के जमाने में बने भूमि अधिग्रहण कानून 1894 में संशोधन के लिए अपने सुझाव तैयार कर लिये है और अगले आठ-दस दिनों में अपनी रिपोर्ट सरकार को मिल जाने की संभावना है। विधि आयोग से सुझाव मिल जाने के बाद राज्य सरकार भूमि अधिग्रहण कानून 1894 में संशोधन को लेकर विधानसभा के आगामी मॉनसून सत्र्ा में विधेयक लाएगी।
भूमि अधिग्रहण कानूनों में जटिलता को लेकर विधि आयोग के अध्यक्ष राजकिशोर महतो का कहना है कि झारखंड में प्रारंभ से ही जमीन अधिग्रहण का सवाल एक जटिल समस्या रही है। झारखंड आंदोलन का प्रमुख कारण भी यही रहा। जब यहां के संसाधनों पर से स्थानीय लोगों की पकड़ कमजोर होने लगी, तो फिर लोगों ने एकजुट होकर अलग राज्य के आंदोलन की शुरुआत की। उन्होंने कहा कि कृषि योग्य भूमि की रक्षा हो सके और पर्यावरण को कोई नुकसान न हो, इसे ध्यान में रखकर भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया पूरी होनी चाहिए, इसके लिए भूमि अधिग्रहण एक्ट में संशोधन आवश्यक है।
भूमि अधिग्रहण एक्ट में प्रावधान
भूमि अधिग्रहण एक्ट 1894 की धारा 4 के तहत जमीन अधिग्रहण की प्रक्रिया शुरु करने के लिए रैयतों को प्रारंभिक सूचना देना अनिवार्य है। प्रारंभिक नोटिस के बाद जमीन अधिग्रहण के मसले पर धारा 5 के तहत गांव में सुनवाई होगी, इसके बाद धारा 6 के तहत अधिघोषणा जारी होगी, जिसकी अधिकतम सीमा एक वर्ष की होती है और इस अधिघोषण के बाद यह तय हो जाता है कि अमुख काम के लिए अमुख जमीन चाहिए ही चाहिए। इसके बाद धारा 7 व 8 के तहत जमीन के नाप-जोख का काम पूरा होता है। फिर धारा 9 के तहत ग्रामीणों को अधिग्रहण होने वाली जमीन के बदले मुआवजे का दर तय होता है। इन सभी में ग्रामीणों की सहभागिता जरुरी है, लेकिन पूर्व में भूमि अधिग्रहण के मामले को देखा जाए, तो यह पता चलता है कि प्रारंभिक सूचना और अधिघोषणा के साथ ही रेट तय होने तक की जानकारी ग्रामीणों को नहीं मिल पाती है और पूरा जमीन अधिग्रहण कागज में ही हो जाता है, यही कारण है कि सरकार उक्त जमीन पर दखल भी नहीं कर पाती है और बाद में नगड़ी गांव जैसी समस्या उत्पन्न होती है।
नए कानून में ग्राम सभाओं की होगी प्रमुख भूमिका
विधि आयोग द्वारा भूमि अधिग्रहण एक्ट में जो संशोधन का प्रस्ताव किया है, उसमें पेसा कानून के तहत अधिसूचित क्षेत्रों के अलावा राज्य भर में पंचायती राज संस्थाओं को पहले से और अधिक अधिकार मिल जाएंगे। नए प्रावधान के तहत भूमि अधिग्रहण की धारा 4 के तहत नोटिस को ग्राम सभा के साथ-साथ गांव-गांव में इसकी जानकारी देनी होगी, जबकि प्रारंभिक सूचना के बाद धारा 5 के तहत ग्रामीण अपनी आपत्ति दर्ज करा सकेंगे, साथ ही ग्राम सभा में इस बात की जानकारी दी जाएगी कि अधिग्रहित भूमि का क्या उपयोग होगा और उसके बदले ग्रामीणों को क्या मिलेगा, इसका सामाजिक-आर्थिक प्रभाव कितना पड़ेगा, कितने परिवार प्रभावित होंगे, कितने विस्थापित होंगे, बगल के गांव या क्षेत्र में क्या प्रभाव पड़ेगा, उनके लिए क्या वैकल्पिक व्यवस्था की जाएगी, पर्यावरण पर क्या प्रभाव पड़ेगा, कैसे प्रभावित परिवारों का पुनर्वास होगा। सबकुछ ग्राम सभा की बैठक में तय होगा और ग्रामीणों के सुझाव को ध्यान में रखा जाएगा, लेकिन यह भी व्यवस्था होगी कि ग्रामीण यदि कोई अतर्कसंगत बातों पर राजनीतिक कारणों से अड़ जाते है, तो सरकार क्या कर पएगी। इसके बाद धारा 7 व 8 के तहत जमीन नापने-जोखने का काम पूरा होगा और फिर ग्रामीणों की सहमति से मुआवजे का दर होगा और अंत में ग्रामीणों की उपस्थिति में उस जमीन पर दखल-कब्जा भी ले लिया जाएगा, ताकि बाद किसी विवाद की गुंजाईश न रहें। इसके बाद हर तीन माह में ग्रामीणों व अधिकारियों की बैठक होगी, जिसमें भूमि अधिग्रहण के पश्चात ग्रामीणों के पुनर्वास के लिए किए जा रहे कार्याें की जानकारी मुहैया करायी जाएगी। साथ ही यह भी साफ किया जाएगा कि अधिग्रहण के बाद वर्षाें तक जमीन खाली न रहे और बाद में उसे दूसरे को बेच नहीं दिया जाए या सबलीज पर नहीं दे दिया जाए।
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