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निजी स्कूलों ने वार्षिक शुल्क में 40 करोड़ की वसूली
रांची,8अगस्त।वार्षिक शुल्क, री-एडमिशन, मिसलेनिस चार्ज के नाम पर भी स्कूल बच्चों से प्रतिवर्ष करोड़ों की वसूली करते हैं. स्कूल प्रति वर्ष सत्र शुरु होने के साथ वार्षिक शुल्क लेते हैं । इस शुल्क को स्कूल प्रबंधन किस मद में खर्च करता है, इसकी जानकारी नहीं दी जाती है। राजधानी के निजी स्कूलों में एनुअल फीस व री-एडमिशन के नाम पर बच्चों से 1500 से लेकर चार हजार रुपये तक लिये जाते हैं।
राजधानी में सीबीएसइ व आइसीएसइ बोर्ड से मान्यता प्राप्त लगभग 65 स्कूल हैं. इसके अलावा लगभग 50 प्ले ग्रुप के वैसे स्कूल हैं, जिन्हें किसी बोर्ड से मान्यता नहीं प्राप्त है, पर वे दूसरे स्कूल की 10वीं की परीक्षा में बच्चों को शामिल करते हैं।
एक स्कूल में औसत दो हजार बच्चे पढ़ाई करते हैं, तो एक सौ स्कूल में बच्चों की कुल संख्या दो लाख हुई। एक बच्चे से औसत वार्षिक शुल्क, री-एडमिशन, मिसलेनिएस चार्ज दो हजार रुपये भी मान लिया जाये तो प्रति वर्ष सत्र शुरु होने के साथ राजधानी के स्कूल बच्चों से लगभग 40 करोड़ रुपये की वसूली कर लेते हैं।
बस भाड़ा की छूट हड़प लेते हैं निजी स्कूल
एक स्कूल बस को सरकार सालाना 10608 रुपये की रियायत देती है
अभिभावक के पास समय नहीं कि वह बच्चों को स्कूल पहुंचा सकें. इसलिए बच्चों को स्कूल बस से भेजते हैं। सरकार स्कूली बस को टैक्स में छूट देती है, ताकि अभिभावकों को बस किराया कम देना पड़ा।
पर यह लाभ स्कूल प्रबंधन बच्चों को नहीं देता। बसों में सुविधा नहीं होती। बच्चे ठूंस दिये जाते हैं। सीटें फटी होती हैं, पर किराया हर साल तेजी से बढ़ाया जाता है। जब कभी प्रशासन कार्रवाई करता है, तो हड़ताल की धमकी दी जाती है और अभिभावकों पर दबाव बनाया जाता है।
किताब-कॉपी व बस संचालन से अच्छी कमाई
किताब-कॉपी के अलावा निजी स्कूलों को बस के परिचालन से भी अच्छी कमाई होती है। अधिकतर स्कूल छात्र-छात्राओं के लिए ठेके पर बस रखते हैं. उन्हें एक रुपये की लागत भी नहीं लगती, पर कमाई लाखों की होती है।
कुछ स्कूल अपने स्तर से बसों का परिचालन करते हैं। ऐसी बसें स्कूल के नाम से निबंधित रहती हैं. इन स्कूलों को सरकार टैक्स में छूट देती है. परिवहन विभाग एडिशनल टैक्स में 50 फीसदी की छूट देता है,पर इसके लिए भी कुछ शर्ते होती हैं।
छूट का यह लाभ बच्चों को देना जरुरी होता है। निजी स्कूल टैक्स में यह छूट तो लेते हैं, पर इसका लाभ बच्चों को नहीं देते. टैक्स छूट के पैसे अपने पास रख लेते हैं। राजधानी रांची के स्कूलों को निबंधित एक बस पर सालाना 10608 रुपये की टैक्स छूट मिलती है।
इस तरह सरकार सभी स्कूलों को सालाना करीब 25 लाख रुपये की टैक्ट छूट देती है। वर्तमान में डीजल की कीमत 51 रुपये प्रति लीटर है। इस तरह 49019 लीटर डीजल की कीमत के बराबर स्कूलों को टैक्स छूट मिलती है। पर यह सारे रकम अपने पास रख लेते हैं. पिछले पांच वर्ष में स्कूलों को लगभग एक करोड़ से अधिक का छूट मिल चुका है।
बिना लागत कमाई
राजधानी के स्कूलों में अधिकतर बस ठेके पर चलती है। इन बसों से स्कूल प्रबंधन बिना लागत प्रति माह लाखों रुपये की कमाई कर रहा है। ठेके पर चलनेवाली 53 सीट की इन बसों के लिए स्कूल प्रति माह 25 से 30 हजार रुपये तक का भुगतान करता है. इन बसों में करीब 75 बच्चे बैठाये जाते हैं।
स्कूल इन बच्चों के अभिभावकों से 400 से 900 रुपये तक का किराया वसूलता है. अगर एक बच्चे का औसत किराया 500 रुपये भी मान लिया जाये, तो एक बस से स्कूल प्रबंधन को प्रति माह 37,500 रुपये मिलते हैं. इस तरह एक बस से स्कूल प्रबंधन को सात से 10 हजार तक का लाभ प्रति माह होता है।
किताब-कॉपी के नाम पर लूट
प्राइवेट स्कूल प्रबंधन, प्रकाशक और किताब दुकानदार मिल कर नर्सरी से लेकर प्लस टू तक की किताब-कॉपियों में छात्र-छात्रओं व अभिभावकों को लूट रहे है। कुछ अपवाद को छोड़ दें, तो इन तीनों का बड़ा गिरोह सक्रिय है। यह मामला सिर्फ रांची तक ही सीमित नहीं है। पूरे झारखंड का यही हाल है।
स्कूल तय करता है कि किस वर्ग में कौन-सी किताब चलेगी. बच्चों को किस दुकान से किताब खरीदनी है, यह भी स्कूल तय करता है. प्रकाशक स्कूल प्रबंधन से सौदा करते हैं और अपने प्रकाशन की किताब की अनुशंसा स्कूल से करवाते हैं. ऐसे प्रकाशक किताब की कीमत लागत से कई गुना अधिक रखते हैं. कोर्स में अपनी किताब चलवाने के लिए प्रकाशक स्कूल प्रबंधन को हिस्सा भी देते हैं.
इतना ही नहीं, स्कूल बच्चों को किताब और कॉपियों के लिस्ट के साथ किताब दुकान का नाम भी थमा देता है. किताब का दाम तो अधिक होता ही है, कॉपियों की कीमत भी बाजार से ज्यादा वसूली जाती है। अगर कोई अभिभावक सिर्फ किताब लेना चाहता है, तो दुकानदार या तो किताब नहीं देते हैं या बाद में आइयेगा, कह कर टाल देते हैं। लिस्ट में किताब-कॉपियों के साथ-साथ इन्हें कवर करने के लिए बुक कवर, नेम चार्ट भी रहता है. यानी इन चीजों को भी उन्हीं दुकानों से अधिक दाम में खरीदने के लिए मजबूर किया जाता है.
20 से 40 फीसदी तक कमीशन
इस धंधे से प्रकाशक, स्कूल प्रबंधन और दुकानदार पैसा कमा रहे हैं, अभिभावक लाचार हैं। खबर यह भी है कि दुकानदारों को प्रकाशक 20 से 40 फीसदी या कभी-कभी इससे भी अधिक कमीशन दे रहे हैं. इसके बावजूद प्रकाशक को मोटा मुनाफा हो रहा है, क्योंकि जिस किताब की लागत 100 होनी चाहिए, उसका मूल्य 180 रुपये प्रिंट किया जाता है. 48 पेज की पतली से एक पुस्तक की कीमत 75 रुपये रखी गयी है. बाजार के जानकार बताते हैं कि इसकी लागत अधिक से अधिक 20 रुपये होनी चाहिए। जिस एनसीइआरटी पुस्तक की कीमत 45 रुपये है, अन्य प्रकाशक एनसीइआरटी पैटर्न पर आधारित लिख कर उसे 160 से 180 रुपये में बेचते हैं।दुकानदार भी एनसीइआरटी की पुस्तक बेचने से बचते हैं, क्योंकि इसमें कमीशन बहुत कम मिलता है।
कॉपियों की बिक्री में भी मनमानी
कॉपियों की बिक्री में भी मनमानी की जा रही है। ब्रांडेड कंपनी की कॉपी के नाम पर 20 रुपये की कॉपियों को 30 रुपये में बेचा जा रहा है। एक आंकड़े के अनुसार, सिर्फ रांची के किताब दुकानदार स्कूली किताबों (अन्य किताब अलग हैं) और कॉपियों से लगभग 12 करोड़ रुपये कमीशन से कमाते हैं। यह राशि इससे अधिक भी हो सकती है, क्योंकि किताबों की कीमत लागत से बहुत ज्यादा है. नर्सरी और प्रेप के बच्चों की किताब के लिए 1500 रुपये तक लिये जा रहे हैं। क्लास थ्री से क्लास सिक्स तक के बच्चों की किताब“कॉपी की कीमत ढाई से तीनध्साढ़े तीन हजार रुपये तक है।
100 से ज्यादा हैं स्कूल
राजधानी रांची में मान्यता प्राप्त व गैर मान्यता प्राप्त लगभग 100 सीबीएसइ व आइसीएसइ स्कूल हैं। स्कूल में बच्चों की संख्या दो हजार से पांच हजार तक है। एक स्कूल में अगर औसत दो हजार बच्चे भी पढ़ते हैं, तो राजधानी में निजी स्कूलों में लगभग दो लाख बच्चे पढ़ते हैं। एक बच्चे की औसत किताब व कॉपी की कीमत दो हजार रुपये भी मान ली जाये, तो दो लाख बच्चों की किताबध्कॉपी की कीमत 40 करोड़ रुपये होगी. ऐसी स्थिति में 30 फीसदी कमीशन पर दुकानदारों को 12 करोड़ रुपये और 40 फीसदी कमीशन पर 16 करोड़ रुपये का लाभ हो रहा है. प्रकाशक इन्हें 40 फीसदी (अधिकतर मामलों में) कमीशन देते हैं, पर ये अभिभावकों को एक पैसे की छूट नहीं देते।
नहीं देते किताब का लिस्ट
राजधानी के अधिकतर स्कूल किताब का लिस्ट नहीं देते। किताब के लिस्ट के बदले अभिभावकों को दुकान के नाम का परचा देते हैं. जिस दुकान से स्कूल की सेटिंग होती है, उसे छोड़ कर दूसरी दुकान से किताब नहीं मिलती। अभिभावक चाह कर भी दूसरी दुकान से किताब नहीं ले सकते।
प्रति वर्ष कुछ न कुछ बदल देते किताब में
स्कूल प्रति वर्ष किताब बदल देते हैं। अगर पूरी किताब नहीं भी बदली गयी तो भी कुछ अध्याय में बदलाव कर देते हैं, ताकि बच्चे पुरानी किताब का उपयोग नहीं कर सके।
परची पर करोड़ों का कारोबार
किताब के करोड़ों के कारोबार का कोई हिसाब-किताब नहीं होता. अधिकतर दुकानदार किताब क्रय का रसीद नहीं देते हैं। रसीद मांगने पर तरह-तरह का बहाना करते हैं. कुछ दुकानदार तो रसीद मांगने पर किताब नहीं देने की बात कहते हैं।
एनसीइआरटी की किताब नहीं
स्कूल सीबीएसइ पाठ्यक्रम के अनुरुप पठन-पाठन की बात करते हैं, पर एनसीइआरटी की किताब के बदले निजी प्रकाशक की किताब से बच्चों को पढ़ाते हैं. कक्षा एक में दर्जन भर से अधिक किताब बच्चों को दिये जा जा रहे हैं, जबकि एनसीइआरटी के अनुरुप कक्षा एक में बच्चों को तीन से चार किताब ही पढ़ाना है।
स्कूल फीस 100 से 300 तक बढ़ी
राजधानी के सीबीएसइ व आइसीएसइ स्कूलों में बच्चों को पढ़ाना अब और महंगा हो गया है. स्कूलों के शिक्षण शुल्क में एक बार फिर 10 से 20 फीसदी तक बढ़ोतरी हुई है। कुछ स्कूलों ने जहां शुल्क बढ़ोतरी का नोटिस अभिभावकों को दे दिया है, वहीं कुछ स्कूल शुल्क बढ़ाने की तैयारी में है।
शिक्षण स्कूल के साथ-साथ बस किराया में भी बढ़ोतरी हुई है, एक बच्चे का शिक्षण शुल्क व बस किराया मिला कर 150 रुपये से 500 रुपये तक बढ़ोतरी हुई है. कुछ स्कूलों में वार्षिक फीस में भी बढ़ोतरी हुई है। शुल्क में इतनी अधिक बढ़ोतरी से अभिभावक काफी परेशान हैं। कई अभिभावकों का कहना है कि निजी स्कूलों में इतनी महंगी शिक्षा हो गयी है कि अब बच्चों को वहां पढ़ाना संभव नहीं है, क्या इन स्कूलों पर सरकार का कोई नियंत्र्ण नहीं होता।
डीजल का दाम बढ़ा
स्कूल बस के किराये में 50 रुपये से लेकर दो सौ रुपये तक की बढ़ोतरी हुई है। स्कूल प्रबंधन का कहना है कि गत वर्ष डीजल की कीमत में कई बार बढ़ोतरी हुई है, ऐसे में बस किराया में बढ़ोतरी आवश्यक हो गया था। शिक्षण शुल्क व बस किराया मिला कर नये सत्र्ा में एक बच्चे पर 150 से लेकर पांच सौ रुपये तक खर्च बढ़ गया है।
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